उत्तराखंड डेस्क रिपोर्ट, देवभूमि उत्तराखंड में नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम पारित नहीं होने पर एक बार फिर राजनीतिक माहौल गर्मा गया है. आपको बता दे, इस बिल को पारित नहीं होने देने की सबसे बड़ी वजह सत्ताधारी भाजपा विपक्षी दल कांग्रेस समाजवादी पार्टी, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों को बता रही है.कुल मिलकर ये विरोध अब राजनैतिक मंचो के साथ सड़को पर भी देखने को मिल रहा है. महिला आरक्षण बिल पर इस समय जमकर राजनीति हो रही है. इसी मुद्दों पर कल बीते वीरवार में कांग्रेस ने देहरादून में विधानसभा भवन के बाहर सरकार के खिलाफ धरना दिया. साथ ही मांग की है कि साल 2023 में राज्यसभा और लोकसभा से पास महिला आरक्षण बिल के आधार पर महिलाओं को 33 प्रतिशत रिजर्वेशन दिया जाए. तो वही आज देहरादून के परेड ग्राउंड में बीजेपी महिला मोर्चा की ओर से महिला जन आक्रोश रैली आयोजित की गई, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं ने हिस्सा लिया, और भाजपा द्वारा 33% महिला आरक्षण को लेकर कांग्रेस और सहयोगी दलों पर महिलाओं के अपमान का आरोप लगाया गया, आपको बता दे,लगातार महिला आरक्षण पर चल रहे विरोध प्रदर्शन के बीच सरकार ने विशेष सत्र आयोजित किया है. 28 अप्रैल को एक दिवसीय विशेष सत्र आहूत किये जाने के दौरान नारी सम्मान लोकतंत्र में अधिकार जैसे विषय पर चर्चा होगी. कुल मिलाकर अब तमाम राजनीतिक पार्टियों चाहे वह सत्ताधारी हो या अन्य छोटे-बड़े विपक्षी दल सभी एकजुट होकर महिला आरक्षण को एक बड़ा चुनावी मुद्दा मान रहे हैं. साथ ही आगामी 2027 में होने वाले चुनाव में सभी राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने ढंग से आम जनता को महिला आरक्षण बिल से फायदे और नुकसान को अभी से गिनवाती नज़र आ रही है. अब देखने वाली बात यह होगी कि आम जनता इस राजनीति से हटकर किस तरह दिखती है.
महिला आरक्षण बिल को लेकर अब प्रदेश में राजनीतिक माहौल बेहद गरमा गया है.सत्ताधारी दल भाजपा का मानना है की इतिहास साक्षी है कि मातृशक्ति कभी हारती नहीं है. 16 और 17 अप्रैल को संसद में हुई चर्चा केवल कुछ विधेयकों तक सीमित नहीं थी, यह देश की आधी आबादी को नीति-निर्माण में समान भागीदारी देने का एक महत्वपूर्ण अवसर था, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, टीएमसी और डीएमके ने इस ऐतिहासिक अवसर का भी विरोध किया. विपक्ष ने सकारात्मक भूमिका निभाने के बजाय राजनीतिक स्वार्थ को प्राथमिकता दी. देशहित से ऊपर दलगत सोच को रखा. वही सत्ता दल सड़को में उतर कर विपक्षी दलों का विरोध कर रहा है.आज परेड ग्राउंड में बीजेपी महिला मोर्चा की ओर से महिला जन आक्रोश रैली आयोजित की गई, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं ने हिस्सा लिया. रैली में मुख्यमंत्री सहित कई नेता, मंत्री और विधायक मौजूद रहे. 33% महिला आरक्षण को लेकर कांग्रेस और सहयोगी दलों पर महिलाओं के अपमान का आरोप लगाया गया. बीजेपी नेताओं ने कहा कि आरक्षण बिल के क्रियान्वयन में बाधा डालकर महिलाओं के अधिकारों को नजरअंदाज किया गया है. इसी के विरोध में महिलाएं सड़कों पर उतरी हैं. रैली में शामिल महिलाओं ने अपने आक्रोश का प्रदर्शन करते हुए साफ संदेश दिया कि वे सम्मान और अधिकारों के लिए हर लड़ाई लड़ने को तैयार हैं।
महिला आरक्षण से जुड़ा मुद्दा अब चुनावी मुद्दा बनता जा रहा है, पूरे देश के साथ साथ अब प्रदेश में भी पक्ष विपक्ष की आपसी बयानबाज़ी देखने को मिल रही है तो वही आक्रोश भी सड़को पर होता नज़र आ रहा है. इसी क्रम में बीते वीरवार उत्तराखंड राज्य विधानसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किए जाने की मांग को लेकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल के नेतृत्व विशाल धरना आयोजित किया गया. कार्यक्रम में पार्टी के वरिष्ठ नेता गण एवं बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने प्रतिभाग किया. विधानसभा भवन के निकट एक दिवसीय धरने में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि सरकार लोगों को गुमराह कर रही है। वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सीएम हरीश रावत का कहना है कि महिला आरक्षण बिल के साथ हम पहले भी खड़े थे और आगे भी मजबूती से खड़े रहेंगे. हमारी चुनौती केंद्र सरकार से यह है कि परिसीमन की गुत्थी सुलझाकर तत्काल लोकसभा में संसद का सत्र बुलाओ और बिल पारित कराओ. हरीश रावत ने कहा कि कांग्रेस की मांग है कि 2027 से विधानसभा, लोकसभा व राज्यसभा की वर्तमान संख्या के आधार पर ही 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं को दिया जाए. कांग्रेस सरकार के समय राज्यसभा में 2010 में ही महिला आरक्षण विधेयक पारित कर दिया था और लोकसभा में भी हम तैयार थे. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का शुभारंभ पंचायतों में किया और उसी के परिणाम स्वरूप देश के अंदर दुनिया के सबसे ज्यादा जितनी महिलाएं दुनिया में पंचायती प्रतिनिधि हैं।वही सभी विपक्षी दल सरकार के विरोध में सड़को पर उतर चुके है.
आपको बता दे, देश में अब तक कुल 4 बार परिसीमन हुआ है. इसके लिए आयोग का गठन किया गया. अब ये 5वीं बार होने जा रहा था. सबसे पहला परिसीमन 1952 में हुआ था. अंतिम परिसीमन 2001 की जनगणना के आधार पर 2002 में हुआ था. दरअसल, 1976 में 42वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से 2001 तक परिसीमन पर रोक लगा दी गई थी, ताकि जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को झटका न लगे.वही आपको बता दे, ये पूरा मामला परिसीमन से जुड़ा हुआ है. यही वजह है कि जहां एक और बीजेपी विपक्षी दलों पर समर्थन न देने का आरोप लगा रही है. तो वहीं, दूसरी ओर विपक्षी दल कांग्रेस इस बात को कह रही है कि महिला आरक्षण बिल साल 2023 में पारित हो चुका है ऐसे में इस संशोधन के जरिए सरकार परिसीमन पर जोर दे रही है. जबकि विपक्ष महिला आरक्षण बिल के समर्थन में है, साथ ही धामी सरकार ने 28 अप्रैल में एक दिवसीय विधानसभा का विशेष सत्र निंदा प्रस्ताव बुलाया है. इससे पहले 27 अप्रैल को सर्वदलीय बैठक भी आयोजित की गई है.बरहाल ऐसे में देखना होगा कि आम जनता इसकी बारीकियों को कितना ध्यान से समझ पाएगी या ये मुद्दा राजनीतिक समुद्र में जनता को गुमराह करने में काफी रहेगा।