kNEWS dESK- सेकुलर शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक और सामाजिक बहसों में अक्सर होता है, लेकिन इसके मानवीय अर्थ को समझना उतना ही जरूरी है। सेकुलरिज्म का मतलब केवल यह नहीं है कि राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं होगा। इसका व्यापक अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति की नागरिक हैसियत उसके धर्म, जाति या आस्था से तय नहीं होगी। हर नागरिक को समान गरिमा और अधिकार मिलेंगे।
भारत के संविधान की प्रस्तावना में ‘सेकुलर’ शब्द 1976 में जोड़ा गया था। हालांकि, समानता, अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म की स्वतंत्रता जैसे मूल विचार संविधान में शुरुआत से ही मौजूद थे। यानी भारत की संवैधानिक व्यवस्था में धर्मनिरपेक्षता की भावना 1976 से पहले भी मौजूद थी। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि भारत सेकुलर कब बना, बल्कि यह भी होना चाहिए कि एक नागरिक के तौर पर सेकुलर मूल्यों को निभाने की हमारी जिम्मेदारी क्या है।
अगर कुछ देर के लिए राजनीतिक बहसों से दूर होकर प्रकृति को देखें, तो समानता का एक सहज उदाहरण सामने आता है। हवा सांस लेने से पहले किसी से उसका धर्म नहीं पूछती। पानी प्यास बुझाने से पहले किसी की जाति नहीं जानता। सूरज किसी घर को उसकी पहचान के आधार पर ज्यादा रोशनी नहीं देता। बारिश खेत में गिरने से पहले यह तय नहीं करती कि जमीन किसकी है।
इंसानों ने धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर अपनी अलग-अलग पहचानें बनाई हैं। इन पहचानों के साथ कई बार ऐसी सीमाएं भी खड़ी हो जाती हैं, जो लोगों को एक-दूसरे से दूर करती हैं। जबकि प्रकृति इन विभाजनों से अलग अपना काम करती है।
एक पक्षी मंदिर के ऊपर से भी उड़ता है और मस्जिद या चर्च के ऊपर से भी। उसके लिए आसमान किसी एक समुदाय का नहीं है। इंसानों ने जमीन को सीमाओं में बांटा, लेकिन आसमान को बांट नहीं सके। हमारी प्रार्थनाओं के तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन इंसानी भावनाओं में कई समानताएं मौजूद रहती हैं।
आस्था व्यक्तिगत है, नागरिकता समान
संविधान व्यक्ति से उसकी आस्था छोड़ने की मांग नहीं करता। कोई मंदिर जा सकता है, कोई मस्जिद, कोई चर्च या गुरुद्वारा। कोई व्यक्ति धार्मिक आस्था न रखने का फैसला भी कर सकता है। यह उसकी अंतरात्मा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा विषय है।
लेकिन राज्य के सामने हर व्यक्ति की नागरिकता समान होनी चाहिए। किसी व्यक्ति का धर्म उसकी नागरिकता की कीमत निर्धारित नहीं कर सकता। यही वह बिंदु है जहां धर्मनिरपेक्षता और समानता एक-दूसरे से जुड़ती हैं।
यदि समानता नहीं होगी तो सेकुलरिज्म सिर्फ एक शब्द बनकर रह जाएगा। अगर अंतरात्मा की स्वतंत्रता नहीं होगी तो धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ भी कमजोर पड़ जाएगा। और अगर भाईचारा नहीं होगा तो कानूनी तौर पर बराबरी के बावजूद समाज में दूरी बनी रह सकती है।
अलग पहचान के बावजूद बराबरी
संवैधानिक व्यवस्था हमें एक जैसा बनने के लिए नहीं कहती। इसका उद्देश्य यह है कि अलग-अलग पहचान रखने वाले लोग भी समान अधिकार और सम्मान के साथ रह सकें। न्याय के साथ स्वतंत्रता, स्वतंत्रता के साथ समानता और समानता के साथ भाईचारा इसी व्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं।
कई बार इंसान अपनी आस्था की रक्षा करने और अपनी पहचान की रक्षा करने के बीच अंतर भूल जाता है। धर्म व्यक्ति के लिए आध्यात्मिक और व्यक्तिगत अनुभव हो सकता है, लेकिन जब धार्मिक पहचान ही सबसे बड़ी पहचान बन जाती है, तो दूसरे की पहचान खतरे की तरह दिखाई देने लगती है।
एक व्यक्ति अपनी परंपरा और धर्म से प्रेम कर सकता है, लेकिन इसके लिए दूसरी परंपरा को छोटा समझना जरूरी नहीं है। अपनी पहचान पर गर्व करना और दूसरे की पहचान का सम्मान करना एक साथ संभव है।
आस्था दीवार नहीं, संवेदना बन सकती है
धर्म और आस्था इंसान को अधिक संवेदनशील, ईमानदार और दयालु बनाने का माध्यम भी हो सकते हैं। लेकिन जब किसी की आस्था दूसरे इंसान के अधिकारों को कमतर मानने का आधार बनने लगे, तब सवाल केवल धर्म का नहीं, बल्कि पहचान के इस्तेमाल का भी हो जाता है।
बच्चों की दुनिया में इसका एक सरल उदाहरण दिखाई देता है। दो बच्चे खेलकर लौटते हैं और दोनों को पानी की जरूरत है तो वे आमतौर पर यह नहीं पूछते कि सामने वाला किस धर्म का है। दोनों के लिए उस समय सबसे बड़ी सच्चाई उनकी प्यास होती है। उम्र बढ़ने के साथ समाज हमें नाम, धर्म, जाति, भाषा और दूसरी पहचान के आधार पर लोगों को देखने की आदत सिखाता है।
शायद परिपक्व समाज का अर्थ यही है कि इन पहचानों के बावजूद हम सामने वाले व्यक्ति को सबसे पहले एक इंसान के रूप में देख सकें।
सेकुलरिज्म सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं
सेकुलरिज्म को केवल राजनीतिक शब्द मानना उसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देता है। यह सामाजिक जीवन से भी जुड़ा हुआ विचार है। इसका मतलब अपनी आस्था छोड़ना नहीं है। इसका मतलब यह है कि अपनी आस्था को दूसरे इंसान के खिलाफ इस्तेमाल न किया जाए।
यह अपनी पहचान मिटाने की बात भी नहीं करता। बल्कि यह सवाल उठाता है कि क्या हम अपनी पहचान के साथ रहते हुए दूसरे व्यक्ति की गरिमा और अधिकारों का भी उतना ही सम्मान कर सकते हैं।
प्रकृति हमें बिना किसी भेदभाव के सांस लेने, पानी और रोशनी का अनुभव कराती है। संविधान इससे आगे बढ़कर नागरिक जीवन के लिए समानता और अधिकारों का ढांचा देता है।
इसलिए सेकुलरिज्म का सवाल केवल यह नहीं है कि कौन खुद को सेकुलर कहता है। असली सवाल हमारे रोजमर्रा के व्यवहार से जुड़ा है। जब हम किसी दूसरे इंसान को देखते हैं, तो क्या सबसे पहले हमें एक इंसान दिखाई देता है, या उसका धर्म, जाति, नाम और पहचान? शायद धर्मनिरपेक्षता की असली समझ इसी सवाल के जवाब में छिपी है।