क्या बिहार में लौट आया है जंगलराज? 2004 और 2025 के अपराध आंकड़ों से समझिए पूरी तस्वीर

बिहार में कानून-व्यवस्था को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। केंद्रीय मंत्री और एलजेपी (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान के साथ बीजेपी सांसद शंभू शरण पटेल ने भी राज्य की पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। इन बयानों के बीच अब 2004 और 2025 के अपराध आंकड़ों की तुलना से यह समझने की कोशिश हो रही है कि पिछले दो दशकों में बिहार में अपराध की स्थिति किस तरह बदली है।

Knews Desk– चिराग पासवान ने जुलाई 2025 में बिहार की कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि राज्य में अपराधियों के सामने पुलिस और प्रशासन के झुकने जैसी स्थिति दिखाई दे रही है। उन्होंने यह भी कहा था कि ऐसी सरकार को समर्थन देने पर उन्हें दुख है। वहीं बीजेपी सांसद शंभू शरण पटेल ने भी पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा था कि अपराधियों में कानून का डर खत्म हो गया है और कई बार पुलिस अधिकारी फोन तक नहीं उठाते।

हालांकि ये नेताओं के राजनीतिक बयान हैं और इन्हें उनके दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। दूसरी ओर, जब 2004 और 2025 के अपराध आंकड़ों को सामने रखकर तुलना की जाती है, तो तस्वीर एक जैसी नहीं दिखती। कुछ गंभीर अपराधों में बड़ी गिरावट आई है, जबकि कुछ अपराध ऐसे भी हैं जिनके मामले दो दशक पहले की तुलना में बढ़े हैं।

2004 में बिहार में हत्या के 3,861 मामले दर्ज हुए थे। डकैती के 1,297, दंगे के 9,199 और रेप के 1,063 मामले दर्ज किए गए थे। वहीं 2025 में हत्या के 2,556, डकैती के 174 और दंगे के 2,502 मामले दर्ज हुए। रेप के मामलों की संख्या 2025 में 2,025 रही।

यानी हत्या के मामलों में 2004 की तुलना में 2025 में करीब 34 फीसदी की कमी दर्ज हुई। डकैती के मामले भी 1,297 से घटकर 174 रह गए। दंगे के मामलों में भी करीब 73 फीसदी की गिरावट दिखाई देती है। हालांकि रेप के मामलों में तस्वीर अलग है। 2004 में जहां 1,063 मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 2,025 हो गई।

2025 में हत्या के मामले 2024 के 2,786 मामलों की तुलना में 8.3 फीसदी कम रहे। इसी तरह डकैती में 26.9 फीसदी, लूट में 21.1 फीसदी, दंगे में 21.5 फीसदी और रेप के मामलों में 8.2 फीसदी की कमी दर्ज की गई। बैंक डकैती के मामलों में 80 फीसदी की गिरावट बताई गई है।

लूट की बात करें तो 2004 में बिहार में 2,909 मामले दर्ज हुए थे। 2025 में यह संख्या 1,558 रही। यानी करीब 46 फीसदी की कमी दर्ज हुई। हालांकि इस अपराध में बीच के वर्षों में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला।

अपहरण के मामलों में तस्वीर अलग है। 2004 में 2,977 अपहरण के मामले दर्ज हुए थे। 2025 का सालाना आंकड़ा यहां उपलब्ध नहीं है। हालांकि 2024 में बिहार में 7,305 अपहरण के मामले दर्ज हुए थे। इनमें 52 मामले फिरौती के लिए अपहरण के थे। विशेषज्ञों के मुताबिक अपहरण की श्रेणी में प्रेम विवाह, गुमशुदगी और अन्य मामलों से जुड़ी FIR भी शामिल हो सकती हैं। इसलिए कुल अपहरण के आंकड़े और फिरौती के लिए किए गए अपहरण को अलग-अलग देखना जरूरी है।

चोरी के मामलों में भी स्थिति हत्या और डकैती जैसी नहीं है। 2004 में बिहार में चोरी के 11,518 मामले दर्ज हुए थे। 2025 का कुल आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन 2001 से 2025 तक के अपराध डेटा के विश्लेषण में चोरी और सेंधमारी को उन अपराधों में शामिल किया गया है, जिनमें हाल के वर्षों में बढ़ोतरी हुई है।

2004 में बिहार में कुल 1,15,216 संज्ञेय अपराध दर्ज हुए थे। उस समय राज्य में पुलिस-जनसंख्या अनुपात भी काफी कम था। प्रति 1,000 लोगों पर सिर्फ 0.65 पुलिसकर्मी उपलब्ध थे। रिपोर्ट में यह भी माना गया था कि उस दौर में कई अपराध दर्ज ही नहीं हो पाते थे।

2025 में बिहार पुलिस की कार्रवाई की बात करें तो DGP विनय कुमार के मुताबिक, पुलिस ने इस दौरान 3,61,364 आरोपियों को गिरफ्तार किया। पुलिस ने 4,963 अवैध हथियार और 30,133 कारतूस बरामद किए। इसके अलावा 74 अवैध मिनी गन फैक्ट्रियों का भी खुलासा किया गया।

साइबर अपराध 2025 में पुलिस के सामने नई बड़ी चुनौती बनकर उभरा। साइबर थानों में 6,319 मामले दर्ज किए गए और 1,050 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। 1930 हेल्पलाइन पर साइबर अपराध से जुड़ी 27.96 लाख शिकायतें मिलीं।

इस तरह 2004 और 2025 के आंकड़ों को साथ रखकर देखें तो बिहार में अपराध की तस्वीर किसी एक आंकड़े से तय नहीं होती। हत्या, डकैती, लूट और दंगे जैसे कई अपराधों में दो दशक के दौरान कमी आई है, जबकि रेप के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज हुई है। अपहरण और चोरी जैसे अपराधों में भी अलग-अलग समयावधियों में अलग तस्वीर सामने आती है।

इसलिए बिहार में ‘जंगलराज’ की वापसी जैसे राजनीतिक दावों को समझने के लिए केवल एक-दो घटनाओं या बयानों के बजाय अपराध की अलग-अलग श्रेणियों, दर्ज मामलों और लंबे समय के आंकड़ों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

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