Knews Desk– सीमा कुमारी का सफर हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के एक छोटे से गांव से शुरू हुआ। 10 जनवरी 2001 को जन्मी सीमा का बचपन मुश्किल परिस्थितियों में बीता। जब वह सिर्फ 12 साल की थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया। परिवार के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया और कम उम्र में ही सीमा को घर और परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ बंटाना पड़ा। उन्होंने खेती-बाड़ी करने के साथ मवेशी चराने का काम भी किया।परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि दौड़ने के लिए जूते खरीदना भी आसान नहीं था। लेकिन सीमा ने परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी। उन्होंने हिमाचल की पहाड़ी पगडंडियों पर नंगे पैर दौड़कर अभ्यास शुरू किया। यही मेहनत आगे चलकर उनके एथलेटिक्स करियर की नींव बनी।
सीमा के सपनों को पूरा करने में उनकी मां ने भी अहम भूमिका निभाई। बेटी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने का मौका मिला तो यात्रा और अन्य खर्चों के लिए उनकी मां ने अपनी जीवनभर की जमा पूंजी तक खर्च कर दी। परिवार की आर्थिक परेशानियों के बावजूद मां ने सीमा के खेल और सपनों के रास्ते में संसाधनों की कमी को बाधा नहीं बनने दिया।सीमा ने साल 2017 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनानी शुरू की। 2017-18 में बैंकॉक में आयोजित एशियाई अंडर-18 चैंपियनशिप में उन्होंने 3000 मीटर रेस में 10:05.27 के समय के साथ ब्रॉन्ज मेडल जीता। इसके बाद उन्होंने नासाउ कॉमनवेल्थ यूथ गेम्स में नौवां स्थान हासिल किया। गिफू में आयोजित एशियन जूनियर चैंपियनशिप में वह पांचवें स्थान पर रहीं। उन्होंने ब्यूनस आयर्स यूथ ओलंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया।
अक्टूबर 2024 में हॉन्गकॉन्ग में आयोजित एशियन क्रॉस कंट्री चैंपियनशिप में सीमा ने 37:20 के समय के साथ गोल्ड मेडल जीता। इससे पहले वह बेलग्रेड वर्ल्ड क्रॉस कंट्री में 34वें स्थान पर रही थीं।साल 2025 भी सीमा के लिए उपलब्धियों से भरा रहा। गुमी में आयोजित एशियन चैंपियनशिप की 10,000 मीटर दौड़ में उन्होंने छठा स्थान हासिल किया। इसी साल वर्ल्ड यूनिवर्सिटी गेम्स में 5000 मीटर इवेंट में 15:35.86 का सीजन-बेस्ट समय निकालते हुए सिल्वर मेडल जीता। वह 2025 दिल्ली हाफ मैराथन में शीर्ष भारतीय महिला फिनिशर भी रहीं।अब एशियन गेम्स 2026 में 10,000 मीटर में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर सीमा ने अपने संघर्ष को एक ऐतिहासिक उपलब्धि में बदल दिया है। नंगे पैर पहाड़ी रास्तों पर दौड़ने से लेकर एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंचने वाली सीमा की कहानी भारतीय खेलों में मेहनत और संघर्ष की एक मिसाल बन गई है।