Knews Desk– ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में प्रशांत महासागर के छोटे से द्वीपीय देश नॉरू ने एक बार फिर साबित कर दिया कि खेलों में सफलता आबादी या संसाधनों की मोहताज नहीं होती। महज 12 हजार से कम आबादी वाले इस देश की 17 वर्षीय वेटलिफ्टर फेमिली क्रिस्टी नोटे ने महिलाओं की 63 किलोग्राम भारवर्ग में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। उनके इस प्रदर्शन ने न केवल नॉरू को मौजूदा खेलों में दूसरा पदक दिलाया, बल्कि कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में देश के कुल पदकों की संख्या 33 तक पहुंचा दी।
फेमिली क्रिस्टी नोटे ने प्रतियोगिता में कुल 216 किलोग्राम वजन उठाते हुए तीसरा स्थान हासिल किया। युवा खिलाड़ी ने दबाव के बीच बेहतरीन प्रदर्शन किया और पोडियम पर जगह बनाकर अपने देश का नाम रोशन किया। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि वह केवल 17 वर्ष की हैं और अपने करियर के शुरुआती दौर में ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़ा मुकाम हासिल कर चुकी हैं।ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में नॉरू का 14 सदस्यीय दल हिस्सा ले रहा है। देश के खिलाड़ी एथलेटिक्स, बॉक्सिंग, जूडो और वेटलिफ्टिंग जैसी प्रतियोगिताओं में भाग ले रहे हैं। हालांकि, नॉरू की सबसे बड़ी पहचान वेटलिफ्टिंग में उसके शानदार प्रदर्शन को लेकर रही है। फेमिली क्रिस्टी का यह ब्रॉन्ज मेडल भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाने वाला साबित हुआ।
नॉरू दुनिया के सबसे छोटे देशों में गिना जाता है। साल 2002 की जनगणना के अनुसार इसकी आबादी 9,872 थी और वर्तमान में भी यह संख्या 12 हजार से कम मानी जाती है। इतनी कम आबादी के बावजूद इस देश ने खेलों की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। सीमित संसाधनों और छोटे खिलाड़ी समूह के बावजूद नॉरू लगातार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रभाव छोड़ता रहा है।नॉरू ने पहली बार वर्ष 1990 में कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा लिया था। तब से लेकर अब तक इस देश ने हर कॉमनवेल्थ गेम्स में कम से कम एक पदक जरूर जीता है। खास बात यह है कि शुरुआती चार कॉमनवेल्थ गेम्स में नॉरू ने हर बार कम से कम एक स्वर्ण पदक अपने नाम किया था। यह रिकॉर्ड किसी भी छोटे देश के लिए बेहद खास माना जाता है।
सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि कॉमनवेल्थ गेम्स में नॉरू के सभी 33 पदक सिर्फ वेटलिफ्टिंग से आए हैं। यानी इस छोटे से देश ने अपनी पूरी खेल पहचान एक ही खेल के दम पर बनाई है। यह उपलब्धि दर्शाती है कि अगर किसी देश में सही योजना, समर्पण और प्रतिभा को अवसर मिले तो सीमित संसाधनों के बावजूद वैश्विक स्तर पर सफलता हासिल की जा सकती है।फेमिली क्रिस्टी नोटे की सफलता आने वाली पीढ़ी के खिलाड़ियों के लिए भी प्रेरणा है। उन्होंने साबित कर दिया कि उम्र और देश का आकार किसी खिलाड़ी की क्षमता तय नहीं करते। 17 साल की इस युवा वेटलिफ्टर ने अपने प्रदर्शन से यह संदेश दिया है कि मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास के बल पर दुनिया के सबसे बड़े खेल मंचों पर भी इतिहास लिखा जा सकता है। ग्लासगो में जीता गया यह ब्रॉन्ज मेडल नॉरू के खेल इतिहास में एक और सुनहरा अध्याय जोड़ गया है।