KNEWS DESK- भारतीय रेलवे ने ट्रेनों में इस्तेमाल होने वाले पुर्जों की गुणवत्ता और उनकी पहचान को लेकर नियम सख्त कर दिए हैं। रेलवे के सामने कई मामलों में यह समस्या आई कि खराब हुए पार्ट्स पर निर्माता कंपनी का नाम या बैच नंबर साफ नहीं था। इससे खराब गुणवत्ता वाले सामान की जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो रहा था। अब रेलवे ने पार्ट्स की मार्किंग और वारंटी से जुड़े नियमों को कड़ा कर दिया है।
नए नियमों के तहत रेलवे को सप्लाई किए जाने वाले हर पुर्जे पर निर्माता का नाम, कोड, सीरियल नंबर, बैच नंबर और निर्माण का महीना व साल दर्ज करना जरूरी होगा। मार्किंग का आकार, स्थान, गहराई और तरीका भी रेलवे डिजाइन एवं मानक संगठन यानी RDSO के निर्धारित मानकों के अनुसार होना चाहिए। जानकारी स्पष्ट और आसानी से पढ़ी जा सकने वाली भी होनी जरूरी है। रेलवे की ओर से जोनल रेलवे, वैगन निर्माताओं और निरीक्षण एजेंसियों को इन नियमों का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। कपलर, ड्राफ्ट गियर, ब्रेक ब्लॉक, कंप्रेस्ड-एयर ब्रेक उपकरण, स्प्रिंग, साइड बियरर, एडॉप्टर, ब्रेक बीम, बोगी और वियर प्लेट्स जैसे महत्वपूर्ण पुर्जों की जांच पर विशेष जोर रहेगा।
अब सामान मिलने के समय, ट्रेन में फिटिंग के दौरान और वर्कशॉप में रैंडम चेकिंग की जाएगी। रूटीन ओवरहॉल डिपो और एग्जामिनेशन यार्ड में भी जांच का दायरा बढ़ाया जाएगा। अगर किसी पार्ट पर मार्किंग गायब, अधूरी, गलत या पढ़ने योग्य नहीं पाई गई, तो रेलवे संबंधित कंपनी का पूरा लॉट रिजेक्ट कर सकता है। ऐसे मामलों में निर्माता या वेंडर को वारंटी के तहत सामान बदलना होगा। कई श्रेणियों में रिजेक्ट किए गए पुर्जों को मुफ्त में बदलने के साथ वापसी और नए सामान की आपूर्ति का परिवहन खर्च भी कंपनी को उठाना होगा। रेलवे ने क्वालिटी एश्योरेंस डायरेक्ट्रेट और थर्ड-पार्टी निरीक्षण एजेंसियों को भी इन नियमों का सख्ती से पालन कराने के निर्देश दिए हैं।