कानपुर के शिवाला इलाके में स्थित दशानन मंदिर अपनी अनोखी धार्मिक परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। देशभर में जहां विजयादशमी पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, वहीं इस मंदिर में दशहरे के दिन रावण की पूजा-अर्चना होती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मंदिर का निर्माण वर्ष 1868 में हुआ था और इसके कपाट साल में केवल एक बार दशहरे पर खोले जाते हैं।
Knews Desk- उत्तर प्रदेश के कानपुर में स्थित दशानन मंदिर दशहरे के अवसर पर विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। इस मंदिर से जुड़ी परंपरा देश के अन्य हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरा उत्सव से अलग है। यहां श्रद्धालु रावण की प्रतिमा के दर्शन करने और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, उन्नाव निवासी महाराजा गुरु प्रसाद शुक्ल ने वर्ष 1868 में इस मंदिर का निर्माण कराया था। भगवान शिव के प्रति उनकी गहरी आस्था थी। उन्होंने कानपुर के शिवाला क्षेत्र में कैलाश मंदिर परिसर विकसित कराया और इसी परिसर में रावण की करीब पांच फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित कराई। वर्ष 2026 के अनुसार, इस परंपरा को लगभग 158 वर्ष पुराना बताया जाता है।
शक्ति का प्रहरी माना जाता है रावण
धार्मिक मान्यताओं में रावण को भगवान शिव का परम भक्त, वेदों का ज्ञाता और विद्वान माना जाता है। इसी वजह से मंदिर में रावण के व्यक्तित्व के ज्ञान और शिवभक्ति से जुड़े पहलुओं को भी महत्व दिया जाता है। यहां रावण को केवल अहंकार और बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि उसकी विद्वता और भगवान शिव के प्रति समर्पण के संदर्भ में भी याद किया जाता है।
दशानन मंदिर से जुड़ी एक अन्य मान्यता के अनुसार, रावण को शक्ति का प्रहरी और माता छिन्नमस्तिका का रक्षक माना जाता है। मंदिर परिसर के सामने माता छिन्नमस्तिका का मंदिर स्थित है। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, रावण की प्रतिमा इस धार्मिक परिसर की रक्षा से जुड़ी परंपरा का हिस्सा है।
दशहरे पर खुलते हैं मंदिर के कपाट
मंदिर की सबसे खास विशेषता इसके कपाट खुलने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार, साल में केवल विजयादशमी के दिन मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। इस दिन श्रद्धालु यहां पहुंचकर रावण की पूजा करते हैं। जहां देश के विभिन्न हिस्सों में दशहरे पर रावण दहन के जरिए बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, वहीं कानपुर का यह मंदिर रावण के ज्ञान और शिवभक्ति से जुड़े पहलुओं को सामने लाता है।