KNEWS DESK- 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध के दिन भरणी नक्षत्र का संयोग बन रहा है। धार्मिक मान्यताओं में भरणी नक्षत्र को पितृ कर्म के लिए विशेष माना गया है। इस दिन तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य करने का विशेष महत्व बताया गया है।
पितृपक्ष का हर दिन पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने का अवसर माना जाता है। इस दौरान लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि पितृपक्ष में विधि-विधान से किए गए पितृ कर्म से पूर्वज प्रसन्न होते हैं और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है।
साल 2026 में 29 सितंबर, मंगलवार को तृतीया श्राद्ध के दिन भरणी नक्षत्र का संयोग बन रहा है। धार्मिक मान्यताओं में भरणी नक्षत्र को पितृ कर्म के लिए विशेष महत्व वाला माना गया है। भरणी नक्षत्र के देवता यमराज माने जाते हैं। यही वजह है कि इस नक्षत्र में पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध करने की परंपरा को खास माना जाता है।
पंचांग के अनुसार, 29 सितंबर को पितृपक्ष की तृतीया तिथि के साथ भरणी नक्षत्र का संयोग बन रहा है। इस वजह से इस दिन किए जाने वाले श्राद्ध, तर्पण और दान का विशेष धार्मिक महत्व बताया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में भरणी नक्षत्र से जुड़े श्राद्ध को महा भरणी श्राद्ध भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण और दान करने से उन्हें संतुष्टि मिलती है।
ज्योतिष में कुल 27 नक्षत्र बताए गए हैं और भरणी इनमें दूसरा नक्षत्र है। भरणी नक्षत्र के अधिपति देवता यमराज माने जाते हैं। हिंदू धार्मिक परंपरा में यमराज को मृत्यु और न्याय का देवता माना गया है। इसी वजह से पितृपक्ष में भरणी नक्षत्र आने पर पितरों के लिए किए जाने वाले कर्मकांड का महत्व और बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यता है कि भरणी नक्षत्र में श्राद्ध, तर्पण और दान करने से पितरों को शांति मिलती है।
पितृपक्ष में दान-पुण्य का भी विशेष महत्व माना जाता है। 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध और भरणी नक्षत्र के संयोग पर पितरों के निमित्त अपनी क्षमता के अनुसार दान करने की परंपरा है। श्राद्ध कर्म में काले तिल का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि तर्पण में काले तिल का प्रयोग करने और इनका दान करने से पितरों को संतुष्टि मिलती है।
भरणी श्राद्ध के दिन जरूरतमंद व्यक्ति को काला छाता दान करने की भी धार्मिक मान्यता है। इसे पितरों के निमित्त किए जाने वाले दान में शामिल किया जाता है। इसी तरह जरूरतमंद व्यक्ति को जूते या चप्पल दान करना भी पितृपक्ष में किए जाने वाले दानों में बताया गया है। मान्यता के अनुसार, इससे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त होती है।
पितृपक्ष में गुड़ और घी का दान भी शुभ माना जाता है। श्रद्धा के साथ जरूरतमंद व्यक्ति को इन चीजों का दान किया जा सकता है। हिंदू धार्मिक परंपरा में गौदान को भी बहुत महत्वपूर्ण दान माना गया है। हालांकि, वास्तविक गौदान हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं होता। ऐसे में अपनी क्षमता के अनुसार गोसेवा या गाय को चारा खिलाने जैसे कार्य किए जा सकते हैं।
तृतीया श्राद्ध के दिन कुतुप मुहूर्त सुबह 11:47 बजे से दोपहर 12:35 बजे तक रहेगा। इसकी अवधि 48 मिनट है। इसके बाद रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:35 बजे से 1:23 बजे तक रहेगा, जिसकी अवधि 48 मिनट है। वहीं अपराह्न काल दोपहर 1:23 बजे से 3:46 बजे तक रहेगा। इसकी अवधि 2 घंटे 23 मिनट है।