KNEWS DESK- समान नागरिक संहिता (UCC) अब उत्तराखंड की सीमाओं से आगे बढ़कर देश की राजनीति में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनती जा रही है। उत्तराखंड में इसे लागू करने के बाद यह मॉडल अब असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के चुनावी एजेंडे में भी प्रमुखता से शामिल हो गया है। उत्तराखंड ने आजादी के बाद UCC लागू करने वाला पहला राज्य बनकर एक नई राजनीतिक और कानूनी बहस को जन्म दिया है।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा किया था, जिसे सरकार बनने के बाद अमल में लाया गया। इस कदम के बाद देश के कई राज्यों में इस कानून को लेकर चर्चा तेज हो गई और धीरे-धीरे यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बन गया।
इसी क्रम में गुजरात विधानसभा में भी मार्च में समान नागरिक संहिता विधेयक पारित किया गया, जिससे यह स्पष्ट संकेत मिला कि यह अवधारणा अब सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं है। इसके बाद असम और पश्चिम बंगाल के चुनावी माहौल में भी UCC को लेकर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है।
असम में भारतीय जनता पार्टी ने अपने संकल्प पत्र में समान नागरिक संहिता लागू करने के साथ-साथ लव जिहाद और लैंड जिहाद के खिलाफ सख्त कानून बनाने का वादा किया है। वहीं पश्चिम बंगाल में भी पार्टी ने सत्ता में आने पर UCC लागू करने का भरोसा मतदाताओं को दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के वादों ने चुनावी माहौल पर गहरा असर डाला है। उत्तराखंड में पहले से लागू कड़े धर्मांतरण कानून और भू-कानून जैसे कदमों को भी UCC से जोड़कर देखा जा रहा है, जिससे पार्टी की नीति को एक व्यापक ढांचा मिलता दिखाई दे रहा है।
चुनावी नतीजों के बाद भारतीय जनता पार्टी के भीतर आत्मविश्वास बढ़ा है और नेता अब इसे आने वाले बड़े चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं। पार्टी के अंदर 2029 लोकसभा चुनाव और आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर रणनीति में UCC जैसे मुद्दों को केंद्रीय भूमिका में रखने की चर्चा तेज हो गई है।
कुल मिलाकर, समान नागरिक संहिता अब सिर्फ कानूनी या प्रशासनिक सुधार का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में एक अहम चुनावी एजेंडा बनता जा रहा है, जिसका प्रभाव आने वाले वर्षों में और अधिक गहराई से देखने को मिल सकता है।