Knews Desk– भारत के माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में पिछले एक साल के दौरान बड़ा बदलाव देखने को मिला है. एक तरफ कर्ज लेने वाले लोगों की संख्या और कुल लोन पोर्टफोलियो घटा है, तो दूसरी तरफ बड़े साइज के लोन की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है. CRIF High Mark की जून 2026 माइक्रो लैंड रिपोर्ट के मुताबिक, माइक्रोफाइनेंस से जुड़े कर्जदारों की संख्या करीब 17 फीसदी घटकर 8 करोड़ से 6.6 करोड़ रह गई है. वहीं कुल माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो 3.59 लाख करोड़ रुपये से घटकर 3.33 लाख करोड़ रुपये रह गया.
इस गिरावट के बावजूद मौजूदा ग्राहकों को मिलने वाले औसत लोन का आकार बढ़ा है. एक एक्टिव लोन पर औसत एक्सपोजर करीब 19 फीसदी बढ़कर लगभग 32,400 रुपये हो गया है. यानी कंपनियां अब कम ग्राहकों को पहले की तुलना में ज्यादा रकम का कर्ज दे रही हैं. एक्टिव लोन की संख्या भी 13.2 करोड़ से घटकर 10.3 करोड़ हो गई है. इससे संकेत मिलता है कि सेक्टर में कर्ज देने की रणनीति पहले के मुकाबले ज्यादा सतर्क हो गई है.
नए लोन के आंकड़े इस बदलाव को और स्पष्ट करते हैं. अप्रैल-जून 2026 तिमाही में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों ने करीब 61,172 करोड़ रुपये के नए लोन बांटे. यह पिछली तिमाही से करीब 20 फीसदी कम है, हालांकि पिछले साल की समान तिमाही के मुकाबले इसमें 18.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. इस दौरान नए लोन का औसत आकार करीब 54,000 रुपये से बढ़कर 62,000 रुपये हो गया.सबसे बड़ा बदलाव छोटे और बड़े लोन की कैटेगरी में दिखाई देता है. 30,000 रुपये तक के नए लोन की रकम एक साल में करीब 35 फीसदी घट गई. इसके उलट 1 लाख रुपये से ज्यादा के लोन में करीब 90 फीसदी की जबरदस्त बढ़ोतरी हुई. नए लोन में 1 लाख रुपये से ज्यादा वाले कर्ज की हिस्सेदारी भी करीब 9 फीसदी से बढ़कर 14 फीसदी हो गई. यानी सेक्टर का झुकाव छोटे टिकट वाले कर्ज से बड़े टिकट वाले लोन की तरफ बढ़ रहा है.
कंपनियां अब नए ग्राहकों के बजाय पुराने ग्राहकों पर भी ज्यादा भरोसा कर रही हैं. वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में दिए गए नए लोन की कुल रकम में करीब 55.5 फीसदी हिस्सा उन्हीं ग्राहकों को मिला, जो संबंधित लेंडर के पुराने ग्राहक थे. 1 लाख रुपये से ज्यादा के लोन में पुराने ग्राहकों की हिस्सेदारी करीब 77.6 फीसदी रही. इससे साफ है कि कंपनियां ऐसे ग्राहकों को ज्यादा रकम देने में सहज हैं, जिनका पिछला भुगतान रिकॉर्ड बेहतर रहा है.
इस बदलाव की एक बड़ी वजह पिछले वर्षों में सामने आई ओवर-बॉरोइंग और डिफॉल्ट की समस्या भी है. जून 2025 में 91 से 180 दिन तक ओवरड्यू पोर्टफोलियो 3.1 फीसदी था, जो जून 2026 में घटकर 0.8 फीसदी रह गया. वहीं 31 से 180 दिन का ओवरड्यू 5.5 फीसदी से घटकर 1.6 फीसदी हो गया. इससे लोन रिकवरी और क्रेडिट क्वालिटी में सुधार के संकेत मिलते हैं.ओवर-बॉरोइंग रोकने के लिए लागू नियमों का भी असर दिख रहा है. एक ग्राहक के लिए अधिकतम तीन माइक्रोफाइनेंस लेंडर की सीमा और 60 दिन से ज्यादा ओवरड्यू होने पर नया लोन नहीं देने जैसे नियम लागू हैं. आंकड़ों के मुताबिक, दो या उससे कम लेंडर वाले ग्राहकों में 31 से 180 दिन का ओवरड्यू सिर्फ 1.9 फीसदी था, जबकि पांच या उससे ज्यादा लेंडर वाले ग्राहकों में यह 7.9 फीसदी तक पहुंच गया.
हालांकि, बड़े लोन की ओर बढ़ता रुझान अपने साथ जोखिम भी लेकर आता है. 2 लाख रुपये से ज्यादा एक्सपोजर वाले ग्राहकों में डेलिंक्वेंसी इंडस्ट्री के औसत से अधिक है. ग्रामीण आय, मानसून, खेती की लागत और महंगाई जैसे कारक भविष्य में कर्ज चुकाने की क्षमता पर असर डाल सकते हैं.कुल मिलाकर माइक्रोफाइनेंस सेक्टर अब ज्यादा सतर्क और कम जोखिम वाले ग्राहकों पर केंद्रित दिखाई दे रहा है. छोटे कर्जदारों की संख्या में कमी और बड़े लोन में तेज बढ़ोतरी से यह सवाल जरूर उठता है कि क्या माइक्रोफाइनेंस अब अपने मूल उद्देश्य यानी छोटे और जरूरतमंद कर्जदारों तक आसान वित्तीय पहुंच से दूर जा रहा है. आने वाले समय में सेक्टर के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि जोखिम नियंत्रित करने के साथ छोटे कर्जदारों की पहुंच भी बनी रहे.