राजकुमार राव एक बार फिर वकील की भूमिका में नजर आए हैं। ‘शाहिद’ में अपने शानदार अभिनय के लिए नेशनल अवॉर्ड जीतने वाले अभिनेता ने फिल्म ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ में देश के चर्चित वकील उज्ज्वल निकम का किरदार निभाया है। फिल्म में 26/11 मुंबई आतंकी हमलों, अजमल कसाब के मुकदमे और उसे फांसी तक पहुंचाने की कानूनी लड़ाई को दिखाया गया है। राजकुमार राव की अदाकारी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन कमजोर पटकथा और कहानी कहने के अंदाज के कारण फिल्म कई जगह प्रभाव छोड़ने में चूक जाती है।
Knews Desk – किसी कलाकार की जिंदगी में कुछ ऐतिहासिक घटनाएं अनायास ही जुड़ जाती हैं। साल 2012 में राजकुमार राव की फिल्म ‘शाहिद’ रिलीज हुई थी। इस फिल्म में वकील शाहिद आजमी की भूमिका निभाने के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिला था। उस समय शायद अभिनेता ने कल्पना भी नहीं की होगी कि करीब 14 साल बाद वह देश के चर्चित वकील उज्ज्वल निकम की भूमिका में भी नजर आएंगे। निकम ने अजमल कसाब जैसे आतंकवादी को फांसी तक पहुंचाने की कानूनी लड़ाई लड़ी थी।
निर्देशक अविनाश अरुण की फिल्म ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ भी एक बायोग्राफिकल ड्रामा है। हालांकि, दोनों फिल्मों के किरदारों के उद्देश्य अलग हैं। ‘शाहिद’ में राजकुमार राव का किरदार निर्दोष लोगों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करता है, जबकि ‘प्रहार’ में वह आतंकवादी हमलों के पीड़ितों को न्याय दिलाने और कसाब को सजा दिलाने की लड़ाई लड़ते नजर आते हैं।
क्या है ‘प्रहार’ की कहानी?
फिल्म में राजकुमार राव के अलावा वामिका गब्बी, ललित प्रभाकर, जयदीप अहलावत और सिकंदर खेर अहम भूमिकाओं में हैं। कहानी में 1993 के मुंबई बम धमाकों का भी जिक्र है, लेकिन मुख्य रूप से 2008 के मुंबई आतंकी हमलों और उसके बाद चली कानूनी लड़ाई पर फोकस किया गया है।
फिल्म की शुरुआत उज्ज्वल निकम की बेटी की शादी के दृश्य से होती है। इसके बाद ताज होटल और सीएसटी स्टेशन पर हुए आतंकी हमलों की घटनाएं सामने आती हैं। कहानी आगे बढ़ती है और उज्ज्वल निकम अजमल कसाब के खिलाफ मुकदमा लड़ना शुरू करते हैं। फिल्म इस कानूनी लड़ाई के विभिन्न पहलुओं से होते हुए कसाब को फांसी दिए जाने तक पहुंचती है।
इस कहानी का बड़ा हिस्सा पहले से ही लोगों को मालूम है। 2008 से 2012 के बीच इस मामले में क्या हुआ, यह सार्वजनिक रिकॉर्ड और मीडिया कवरेज का हिस्सा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब मुंबई हमलों पर पहले भी फिल्में और वेब सीरीज बन चुकी हैं, तो ‘प्रहार’ क्यों देखी जाए? इसका जवाब काफी हद तक राजकुमार राव के अभिनय और उज्ज्वल निकम के व्यक्तिगत संघर्ष को पर्दे पर उतारने की कोशिश में मिलता है।
उज्ज्वल निकम की कानूनी लड़ाई और निजी जिंदगी का संघर्ष
‘प्रहार’ यह दिखाने की कोशिश करती है कि आतंकवादी हमलों का असर केवल घटनास्थल तक सीमित नहीं रहता। यह हमला इंसानियत, मानवता और न्याय की व्यवस्था को भी चुनौती देता है। उज्ज्वल निकम के लिए यह केवल अदालत में मुकदमा जीतने की लड़ाई नहीं थी, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ न्याय सुनिश्चित करने का मिशन भी था।
फिल्म में निकम की निजी जिंदगी और पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच का संघर्ष भी दिखाया गया है। एक तरफ कसाब के खिलाफ कानूनी लड़ाई, पाकिस्तान की कूटनीतिक चुनौतियां और अदालत में लगातार बदलते हालात हैं, तो दूसरी तरफ पत्नी की गंभीर बीमारी, बेटे के साथ उलझनें और बेटी की शादी जैसी पारिवारिक जिम्मेदारियां भी हैं।
इन परिस्थितियों के बीच निकम का अपने लक्ष्य पर टिके रहना फिल्म का महत्वपूर्ण पहलू है। वह तमाम मुश्किलों के बावजूद अपनी लड़ाई जारी रखते हैं और अंततः कसाब को सजा दिलाने में सफल होते हैं।
राजकुमार राव ने इस किरदार को पूरी गंभीरता के साथ निभाया है। फिल्म में निकम के संघर्ष और उनके दृढ़ निश्चय को सामने लाने की कोशिश की गई है। कसाब से जुड़ा उनका एक संवाद भी उनके नजरिये को सामने रखता है, जिसमें वह कहते हैं, “मुझे किसी केस को जीतने की खुशी तब तक नहीं मिलती, जब तक मुजरिम के भीतर गलती की टीस पैदा न हो।”
राजकुमार राव ने अपने अंदाज में निभाया उज्ज्वल निकम का किरदार
अभिनय के लिहाज से ‘प्रहार’ काफी हद तक राजकुमार राव की फिल्म बन जाती है। उन्होंने उज्ज्वल निकम के व्यक्तित्व को समझते हुए किरदार को अपने अंदाज में पेश किया है। आमतौर पर बायोपिक में कलाकार वास्तविक व्यक्ति के हाव-भाव, बोलने के तरीके और व्यक्तित्व की नकल करने की कोशिश करते हैं। ‘संजू’ में रणबीर कपूर और ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में अनुपम खेर इसके उदाहरण हैं।
राजकुमार राव यहां उज्ज्वल निकम की नकल करने के बजाय उनके व्यक्तित्व को अपने अभिनय के जरिए सामने लाते हैं। हालांकि, निकम की हिंदी में मराठी लहजे का प्रभाव है, लेकिन राजकुमार राव के संवादों में यह प्रभाव सीमित नजर आता है। कुछ जगह मराठी शब्द जरूर सुनाई देते हैं, मगर उनका हिंदी उच्चारण सामान्य हिंदी बोलने वालों जैसा लगता है।
इसके बावजूद उनका अभिनय फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी है। किरदार के भावनात्मक और कानूनी संघर्ष को वह प्रभावशाली तरीके से पर्दे पर उतारते हैं।
सहायक कलाकारों ने भी छोड़ी छाप
फिल्म में अन्य कलाकारों का काम भी उल्लेखनीय है। पाकिस्तानी अधिकारी चौधरी जुल्फिकार अली की भूमिका में जयदीप अहलावत की मौजूदगी कहानी को गंभीरता देती है। कसाब के वकील की भूमिका में सिकंदर खेर ने अच्छा अभिनय किया है, जबकि अजमल कसाब के किरदार में ललित प्रभाकर को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला है।
कसाब के किरदार के जरिए कहानी को एक अलग विस्तार मिलता है। ललित प्रभाकर ने इस भूमिका में अपनी छाप छोड़ी है। उज्ज्वल निकम के बेटे अनिकेत निकम की भूमिका में ऋतिक सहोर का अभिनय भी अच्छा है। वहीं, जस्टिस एमएल ताहिलियानी के किरदार में आशीष विद्यार्थी प्रभाव छोड़ते हैं।
हालांकि, उज्ज्वल निकम की पत्नी ज्योति निकम की भूमिका में वामिका गब्बी उतना प्रभावित नहीं कर पातीं। उनकी समस्या अभिनय से ज्यादा किरदार की उम्र और व्यक्तित्व को सहजता से प्रस्तुत करने में नजर आती है।
कहानी और पटकथा में रह गई कमी
अच्छे अभिनय के बावजूद फिल्म कई मोर्चों पर कमजोर पड़ती है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मुंबई हमलों और कसाब के मुकदमे पर पहले भी कई फिल्में और वेब सीरीज बन चुकी हैं। ऐसे में ‘प्रहार’ को कहानी कहने के तरीके में कुछ नया प्रस्तुत करना चाहिए था, ताकि दर्शक भावनात्मक रूप से जुड़ सकें और उन्हें एक अलग अनुभव मिल सके।
अफसोस कि पटकथा इस चुनौती पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती। फिल्म का शुरुआती आधा घंटा काफी धीमा और नीरस लगता है। कोर्टरूम ड्रामा को मनोरंजक बनाने के लिए जरूरी नहीं कि उसमें अतिरिक्त मसाले जोड़े जाएं, लेकिन भावनात्मक गहराई और प्रभावशाली प्रस्तुति से उसे बेहतर बनाया जा सकता था।
फिल्म के कुछ हिस्सों में यह भावनात्मक प्रभाव देखने को मिलता है। राजकुमार राव का मोनोलॉग भी असरदार है, लेकिन कहानी को जोड़ने और उसे प्रस्तुत करने के तरीके में कमी के कारण फिल्म कई जगह दर्शकों के धैर्य की परीक्षा लेती है। लेखक सुमिय रॉय और निर्देशक अविनाश अरुण इस मोर्चे पर उम्मीदों पर पूरी तरह खरे नहीं उतरते।
उज्ज्वल निकम की पूरी कहानी नहीं दिखा पाई ‘प्रहार’
फिल्म की एक और बड़ी कमजोरी यह है कि उज्ज्वल निकम के लंबे कानूनी करियर को मुख्य रूप से कसाब के मुकदमे तक सीमित कर दिया गया है। फिल्म के शीर्षक से उम्मीद होती है कि इसमें निकम की जिंदगी और उनके कानूनी संघर्ष के व्यापक पहलुओं को भी जगह मिलेगी।
1993 के मुंबई बम धमाकों का जिक्र जरूर आता है, लेकिन निकम के करियर से जुड़े अन्य चर्चित मामलों को विस्तार नहीं दिया गया है। गुलशन कुमार हत्याकांड, प्रमोद महाजन हत्याकांड और 2013 के मुंबई सामूहिक बलात्कार मामले जैसे मुकदमों में उनकी भूमिका भी उनकी पेशेवर जिंदगी के महत्वपूर्ण हिस्से रहे हैं। इन पहलुओं को शामिल करके फिल्म को और व्यापक तथा प्रेरक बनाया जा सकता था।
इस तरह फिल्म उज्ज्वल निकम के जीवन और करियर की संभावनाओं का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाती। कानूनी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों और इस पेशे में आने की इच्छा रखने वाले युवाओं के लिए उनकी जिंदगी एक प्रेरक कहानी बन सकती थी, लेकिन फिल्म इस अवसर को काफी हद तक गंवा देती है।
हालांकि, फिल्म मुंबई हमलों के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाने की कोशिश करती है। कसाब के किरदार के जरिए पाकिस्तान में आतंकवाद के लिए युवाओं को तैयार करने, उन्हें पैसों और जन्नत के सपने दिखाने जैसे पहलुओं को दिखाया गया है। जेल में अजान सुनकर कसाब का यह पूछना कि भारत में भी ईद मनाई जाती है, जैसे दृश्य उसके नजरिये और पृष्ठभूमि को सामने लाने का प्रयास करते हैं।
कैसी है ‘प्रहार’?
‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ एक गंभीर विषय पर बनी फिल्म है, जिसमें राजकुमार राव का अभिनय सबसे बड़ी ताकत है। सहायक कलाकार भी अपनी भूमिकाओं में प्रभाव छोड़ते हैं। हालांकि, कमजोर पटकथा, धीमी शुरुआत और उज्ज्वल निकम के जीवन के सीमित चित्रण के कारण फिल्म उस स्तर तक नहीं पहुंच पाती, जिसकी इससे उम्मीद की जा सकती थी।
अगर आप राजकुमार राव के अभिनय और कोर्टरूम ड्रामा में दिलचस्पी रखते हैं, तो फिल्म आपको आकर्षित कर सकती है। लेकिन मुंबई हमलों और कसाब के मुकदमे पर पहले से मौजूद कहानियों के बीच यह फिल्म बहुत कुछ नया जोड़ने में पीछे रह जाती है।
फिल्म की जानकारी:
- फिल्म: प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम
- निर्देशक: अविनाश अरुण
- कलाकार: राजकुमार राव, वामिका गब्बी, जयदीप अहलावत, आशीष विद्यार्थी और सिकंदर खेर
- रेटिंग: 2.5/5