जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर शुरू हुई सियासी उठापटक थमने का नाम नहीं ले रही है। कैबिनेट विस्तार के बाद नाराज विधायकों के तेवर लगातार तल्ख होते जा रहे हैं। नाराज विधायकों के बीच अब तक चार दौर की बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन कोई ठोस समाधान निकलता नजर नहीं आ रहा है। इस बीच करीब 18 नाराज विधायक आज पार्टी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात कर सकते हैं।
Knews Desk – श्रीनगर में गुपकार स्थित फारूक अब्दुल्ला के आवास पर सुबह 10 बजे के बाद यह बैठक प्रस्तावित है। दरअसल, कैबिनेट विस्तार के अगले दिन सबसे पहले विधायक कैसर लोन के हुमहामा स्थित आवास पर नाराज विधायकों की बैठक हुई। इसके बाद नजीर गुरेजी के आवास पर बैठक हुई। फिर फारूक शाह और पूर्व सांसद व विधायक हसनैन मसूदी के आवास पर भी नाराज विधायकों ने मंथन किया। नाराज विधायकों का कहना है कि वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
वहीं, फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला की कोशिश होगी कि बातचीत के जरिए इस असंतोष को खत्म किया जाए। हालांकि, इस बैठक में उन निर्दलीय विधायकों को शामिल नहीं किया गया है, जो उमर सरकार को समर्थन दे रहे हैं और खुद भी नाराज बताए जा रहे हैं। इन विधायकों को मिलाकर नाराज विधायकों की संख्या करीब 25 बताई जा रही थी। ऐसे में आज की बैठक बेहद अहम मानी जा रही है। सवाल यही है कि क्या फारूक और उमर अब्दुल्ला नाराज विधायकों को मनाने में कामयाब होंगे या फिर नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर सियासी संकट और गहराएगा?
नेशनल कॉन्फ्रेंस में असंतोष की वजह 27 अक्टूबर को हुआ कैबिनेट विस्तार है। इस विस्तार में चार नए मंत्रियों को शामिल किया गया था। इसके साथ ही मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की संख्या बढ़कर नौ हो गई, जो निर्धारित अधिकतम सीमा है। लेकिन पार्टी के कुछ वरिष्ठ विधायक मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने से नाराज बताए जा रहे हैं। इनमें छह बार के विधायक मुबारक गुल का नाम भी सामने आया है।
नाराज विधायकों की मांग सिर्फ मंत्री बनाए जाने तक सीमित नहीं बताई जा रही है। वे मंत्रिमंडल में बदलाव चाहते हैं। उनकी मांग है कि दो साल का कार्यकाल पूरा कर चुके मंत्रियों को हटाया जाए। इसके अलावा मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी को हटाने की मांग भी सामने आई है। कुछ विधायकों ने पार्टी संगठन में बदलाव और पदाधिकारियों को हटाने की मांग भी रखी है। विधायकों का तर्क है कि पार्टी के भीतर बदलाव जरूरी है।
अब जम्मू-कश्मीर विधानसभा के नंबर गेम पर नजर डालें तो विधानसभा में कुल 90 निर्वाचित सीटें हैं। किसी भी सरकार को बहुमत साबित करने के लिए 46 विधायकों का समर्थन चाहिए। मौजूदा स्थिति में नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास 41 विधायक हैं। कांग्रेस के छह विधायक हैं। इसके अलावा छह निर्दलीय और एक सीपीआईएम विधायक का समर्थन सरकार को हासिल है। इस तरह उमर अब्दुल्ला सरकार के समर्थन में कुल 54 विधायक हैं।
वहीं, विपक्ष की बात करें तो बीजेपी के 29, पीडीपी के चार, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस का एक, आम आदमी पार्टी का एक और एक निर्दलीय विधायक विपक्ष की तरफ हैं। यानी मौजूदा नंबर गेम में उमर सरकार बहुमत के आंकड़े से ऊपर है, लेकिन अगर नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष इस्तीफे तक पहुंचता है तो विधानसभा का गणित बदल सकता है।
अगर 20 विधायकों के इस्तीफे स्पीकर स्वीकार कर लेते हैं, तो सदन की प्रभावी सदस्य संख्या घटकर 70 रह जाएगी। ऐसी स्थिति में बहुमत का आंकड़ा भी घटकर 36 हो जाएगा। नेशनल कॉन्फ्रेंस के 41 विधायकों में से 20 के इस्तीफे के बाद पार्टी के पास 21 विधायक बचेंगे। इसके बाद गठबंधन का हिसाब देखें तो नेशनल कॉन्फ्रेंस के 21, कांग्रेस के छह, निर्दलीय छह और सीपीआईएम का एक विधायक मिलाकर कुल संख्या 34 होगी।
यानी 20 विधायकों के इस्तीफे स्वीकार होने की स्थिति में भी सत्तारूढ़ गठबंधन के पास 34 विधायक रहेंगे, जबकि बहुमत का आंकड़ा 36 होगा। इस तरह सरकार दो विधायकों से पीछे हो सकती है। अगर समर्थन दे रहा एक निर्दलीय विधायक भी सरकार से समर्थन वापस ले लेता है, तो गठबंधन की संख्या घटकर 33 रह जाएगी। यानी बहुमत के आंकड़े से तीन कम और सरकार अल्पमत में आ सकती है।
नाराज विधायकों के सामने सिर्फ इस्तीफा देने का ही विकल्प नहीं है। वे पार्टी छोड़ने या दूसरी पार्टी के साथ जाने की कोशिश भी कर सकते हैं। हालांकि, इसमें दलबदल कानून की बड़ी बाधा है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर भी संविधान की दसवीं अनुसूची यानी एंटी डिफेक्शन कानून लागू होता है। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की धारा 28 के तहत यह प्रावधान विधानसभा पर लागू है। इस कानून के मुताबिक, अगर कोई विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या पार्टी के व्हिप के खिलाफ वोट करता है, तो उसकी सदस्यता जा सकती है।
पार्टी में विलय के लिए भी एक शर्त है। इसके लिए संबंधित विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों की सहमति जरूरी है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के 41 विधायकों में दो-तिहाई का आंकड़ा 28 होता है, यानी 20 विधायकों का समूह इस शर्त को पूरा नहीं करता। इस पूरे घटनाक्रम में निर्दलीय विधायकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
उमर अब्दुल्ला सरकार को छह निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल है। इनमें से कुछ विधायकों के भी नाराज होने की खबरें सामने आई हैं। अगर नेशनल कॉन्फ्रेंस के 20 विधायक इस्तीफा देते हैं और छह निर्दलीय विधायक सरकार के साथ बने रहते हैं, तो गठबंधन की संख्या 34 होगी। लेकिन अगर इनमें से कोई निर्दलीय समर्थन वापस लेता है, तो सरकार अल्पमत में जा सकती है।