KNEWS DESK- छात्र आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई और कथित लाठीचार्ज से जुड़े मामलों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि छात्रों का विरोध-प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण और संविधान के दायरे में था। ऐसे में प्रदर्शन के दौरान हिंसा करने या कानून अपने हाथ में लेने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस की कथित ज्यादतियों और बल प्रयोग के आरोपों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले से जुड़ी सभी याचिकाओं को एक साथ सुनने का फैसला किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है और इसे संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। हालांकि, ऐसे आंदोलनों में कई बार बाहरी तत्व भी शामिल हो जाते हैं, जो माहौल बिगाड़ने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान छात्रों की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने आरोप लगाया कि दिल्ली, बिहार, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में प्रदर्शनकारियों पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया गया। अदालत के सामने पेलेट गन के इस्तेमाल, इलेक्ट्रिक बैटन, कील लगी लाठियों, सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों द्वारा कथित मारपीट और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ दुर्व्यवहार जैसे आरोप रखे गए। इन दावों के समर्थन में मीडिया रिपोर्ट और वीडियो फुटेज का भी हवाला दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी पुलिसकर्मी या अधिकारी ने अपनी सीमाओं का उल्लंघन किया है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि आदेश देने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच जरूरी है। अदालत ने कहा कि यदि जिम्मेदारी तय नहीं होती, तो जांच का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। सुनवाई के दौरान बिहार में छात्र आंदोलन के दौरान एक पुलिसकर्मी द्वारा AK-47 के इस्तेमाल का मुद्दा भी उठा। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि संबंधित पुलिसकर्मी को निलंबित कर दिया गया है, लेकिन पूरे घटनाक्रम की जवाबदेही तय होना आवश्यक है। इस पर अदालत ने कहा कि सभी मामलों की वैज्ञानिक तरीके से जांच होगी और जांच समिति या विशेष जांच दल (SIT) की संरचना पर बाद में निर्णय लिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई के लिए पहले से मौजूद दिशा-निर्देशों की समीक्षा की जा सकती है। अदालत ने कहा कि 2018 में जारी दिशानिर्देशों को मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार अपडेट करने की जरूरत हो सकती है, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों में स्पष्ट और प्रभावी प्रोटोकॉल लागू किया जा सके। इसके अलावा अदालत के सामने यह भी दावा किया गया कि कई नाबालिग छात्रों को लंबे समय तक हिरासत में रखा गया और प्रदर्शनकारियों के साथ गैरकानूनी व्यवहार किया गया। इन सभी आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच पूरी तरह स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए तथा जो भी व्यक्ति कानून का उल्लंघन करता पाया जाएगा, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि न तो प्रदर्शनकारियों को हिंसा का अधिकार है और न ही कानून लागू करने वाली एजेंसियां तय प्रक्रिया से बाहर जाकर बल प्रयोग कर सकती हैं। अदालत अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को करेगी, जहां जांच की रूपरेखा और आगे की प्रक्रिया पर विचार किया जाएगा।