देहरादून के डॉक्टरों ने शराब पर निर्भर मरीजों पर tDCS तकनीक का ट्रायल किया। पांच दिनों में 10 सेशन देने के बाद मरीजों में शराब पीने की इच्छा में उल्लेखनीय कमी देखी गई।
Knews Desk-शराब की गंभीर लत से जूझ रहे लोगों के इलाज को लेकर एक नई रिसर्च से उम्मीद जगी है। उत्तराखंड के देहरादून स्थित हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज और श्री गुरु राम राय मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सकों ने शराब पर अत्यधिक निर्भर मरीजों पर ब्रेन स्टिमुलेशन की एक नॉन-इनवेसिव तकनीक का सफल परीक्षण किया है। रिसर्च के अनुसार, इस तकनीक की मदद से मरीजों में शराब पीने की तीव्र इच्छा यानी क्रेविंग को कम करने में मदद मिली।
इस रिसर्च को मेडिकल जर्नल ‘प्राइमरी केयर कंपेनियन फॉर सीएनएस डिसऑर्डर्स’ में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह तकनीक खासतौर पर उन मरीजों के लिए संभावित विकल्प बन सकती है, जिन्हें नशा मुक्ति के दौरान दवाइयों से परेशानी होती है या जो नियमित रूप से दवाएं लेने में सहज नहीं हैं।
इस तकनीक को ट्रांसक्रेनियल डायरेक्ट करंट स्टिमुलेशन यानी tDCS कहा जाता है। इसमें मरीज के सिर पर इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं और उनके जरिए बहुत कम मात्रा में इलेक्ट्रिक करंट दिया जाता है। इसमें किसी तरह की सर्जरी या चीरा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।
रिसर्च में 18 से 60 वर्ष की उम्र के शराब पर अत्यधिक निर्भर मरीजों को शामिल किया गया। मरीजों के दिमाग के डॉर्सोलैटरल प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स हिस्से को टारगेट किया गया। इसके लिए सिर पर इलेक्ट्रोड लगाए गए और 2 मिलीएम्पियर का हल्का इलेक्ट्रिक करंट दिया गया।
क्लिनिकल ट्रायल के दौरान मरीजों को लगातार पांच दिनों तक कुल 10 सेशन दिए गए। हर दिन 20-20 मिनट के दो सेशन कराए गए। रिसर्च में वास्तविक tDCS थेरेपी लेने वाले मरीजों की तुलना उन मरीजों से की गई, जिन्हें Sham Treatment दिया गया था।
रिसर्च के नतीजों में सामने आया कि वास्तविक tDCS थेरेपी लेने वाले मरीजों में शराब पीने की इच्छा में 14.17 अंक की कमी दर्ज की गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, Sham Treatment लेने वाले मरीजों की तुलना में वास्तविक इलेक्ट्रिक थेरेपी वाले मरीजों में सुधार लगभग दोगुनी तेजी से देखा गया।
रिसर्च में शामिल मनोचिकित्सक डॉ. रॉबिन विक्टर और डॉ. प्रियरंजन अविनाश के मुताबिक, नशा मुक्ति के दौरान कई मरीज दवाएं लेने से बचते हैं। वहीं, कुछ मरीजों को एंटी-डिप्रेशन या डिटॉक्स से जुड़ी दवाओं के साइड इफेक्ट भी परेशान करते हैं। ऐसे मरीजों के लिए tDCS एक संभावित वैकल्पिक थेरेपी हो सकती है।
ट्रायल के दौरान इस तकनीक से कोई गंभीर नकारात्मक साइड इफेक्ट सामने नहीं आया। रिसर्च टीम में डॉ. ट्विंकल शर्मा, डॉ. प्रवीण रिखारी और डॉ. शोभित गर्ग समेत कई मनोरोग विशेषज्ञ शामिल रहे।
विशेषज्ञों के मुताबिक, शुरुआती डिटॉक्स फेज के दौरान नशा मुक्ति केंद्रों और अस्पतालों में इस तकनीक का इस्तेमाल उपयोगी हो सकता है। हालांकि, tDCS ऐसी थेरेपी नहीं है जिसे व्यक्ति खुद से इस्तेमाल करे। इसे योग्य डॉक्टरों की निगरानी और विशेष मेडिकल उपकरणों के जरिए ही दिया जाना चाहिए।
शराब की लत का इलाज मरीज की स्थिति के आधार पर अलग-अलग हो सकता है। इसमें दवाइयों के साथ काउंसलिंग और अन्य उपचारों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।