Knews Desk- मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यहां प्रतिदिन तड़के होने वाली भस्म आरती विश्व प्रसिद्ध है। बाबा महाकाल को अर्पित की जाने वाली भस्म और इससे जुड़ी परंपरा को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष आस्था है। लंबे समय से ऐसी मान्यता प्रचलित रही है कि पहले महाकाल की भस्म आरती में श्मशान में जलने वाले शवों की राख का इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि वर्तमान में भगवान महाकाल को विशेष वैदिक विधि से तैयार की गई पवित्र भस्म अर्पित की जाती है।
वर्तमान में भस्म तैयार करने के लिए कपिला गाय के कंडों का इस्तेमाल किया जाता है। इनके साथ पीपल, बरगद, शमी, पलाश और बेर जैसे पवित्र एवं औषधीय वृक्षों की लकड़ियों तथा अन्य धार्मिक सामग्री को अग्नि में जलाया जाता है।
महाकाल मंदिर की अखंड धूनी में इन्हें प्रज्वलित करने के बाद अग्नि के पूरी तरह शांत होने का इंतजार किया जाता है। इसके बाद बची हुई राख को सावधानी से एकत्र किया जाता है। राख को तीन से चार बार छाना जाता है, जिससे वह बेहद महीन और शुद्ध हो जाए। इस पूरी प्रक्रिया में धार्मिक नियमों और पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
मंत्रोच्चार के बीच बाबा महाकाल को चढ़ती है भस्म
प्रतिदिन तड़के बाबा महाकाल का अभिषेक और पूजन किया जाता है। इसके बाद भगवान का विशेष श्रृंगार होता है। भस्म अर्पित करने के दौरान शिवलिंग को पवित्र वस्त्र से ढका जाता है।
शुक्ल यजुर्वेद के मंत्रों के उच्चारण के बीच महानिर्वाणी अखाड़े के संत बाबा महाकाल को पवित्र भस्म अर्पित करते हैं। इसी धार्मिक अनुष्ठान को भस्म आरती के नाम से जाना जाता है। इस दिव्य आरती के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं।
महाकाल की भस्म आरती को लेकर लंबे समय से यह धार्मिक मान्यता चली आ रही है कि प्राचीन काल में भगवान शिव का श्रृंगार श्मशान में जलने वाले शवों की राख से किया जाता था। समय के साथ इस परंपरा में बदलाव आया और अब शवों की राख के बजाय धार्मिक विधि से तैयार की गई शुद्ध भस्म का प्रयोग किया जाता है।
भस्म आरती के पीछे क्या है पौराणिक कथा?
भस्म आरती को लेकर एक प्रचलित पौराणिक कथा भी बताई जाती है। मान्यता के मुताबिक, प्राचीन समय में उज्जैन में दूषण नामक राक्षस का आतंक था। उसके अत्याचारों से परेशान लोगों और ब्राह्मणों ने भगवान शिव से रक्षा की प्रार्थना की।
कथा के अनुसार भगवान शिव ने दूषण को समझाने का प्रयास किया, लेकिन उसके नहीं मानने पर शिव ने उसका वध कर उसे भस्म कर दिया। इसके बाद भगवान शिव ने उसकी भस्म को अपने शरीर पर धारण किया। मान्यता है कि यहीं से भगवान शिव को भस्म अर्पित करने और उससे श्रृंगार करने की परंपरा जुड़ी।
भगवान शिव को क्यों प्रिय मानी जाती है भस्म?
सनातन परंपरा में भस्म को जीवन की नश्वरता का प्रतीक भी माना जाता है। इसका संदेश है कि संसार में जन्म लेने वाले प्रत्येक जीव और भौतिक वस्तु का अंत निश्चित है। भगवान शिव का भस्म धारण करना वैराग्य और सांसारिक मोह से मुक्ति का प्रतीक माना जाता है।
भस्म से जुड़ी माता सती की एक अन्य धार्मिक कथा भी प्रचलित है। मान्यता है कि माता सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव उनके शरीर को लेकर विचरण कर रहे थे। इस दौरान सती की भस्म शिव के शरीर पर पड़ने से उनका क्रोध शांत हुआ। इसी कारण भस्म को भगवान शिव की प्रिय वस्तुओं में माना जाता है।
आज भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है भस्म आरती
उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती आस्था और सनातन परंपरा का अनूठा संगम है। समय के साथ भस्म तैयार करने की प्रक्रिया में बदलाव जरूर आया, लेकिन इस अनुष्ठान का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बरकरार है।
बाबा महाकाल की भस्म आरती के दर्शन के लिए देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं। भक्तों की मान्यता है कि भस्म आरती के दर्शन और बाबा महाकाल की पूजा से भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है।