Knews Desk– कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय जैवलिन थ्रो खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए देश को दो पदक दिलाए। जहां स्टार एथलीट नीरज चोपड़ा ने सिल्वर मेडल अपने नाम किया, वहीं युवा खिलाड़ी यशवीर सिंह ने अपने पहले ही कॉमनवेल्थ गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। यशवीर की यह सफलता इसलिए भी खास रही क्योंकि उन्होंने दबाव के सबसे कठिन क्षण में अपने आखिरी थ्रो में करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए पोडियम पर जगह बनाई।ग्लासगो में आयोजित पुरुषों के जैवलिन थ्रो फाइनल में दुनिया के कई दिग्गज खिलाड़ी मैदान में मौजूद थे। मुकाबला बेहद रोमांचक रहा और आखिरी प्रयास तक मेडल की तस्वीर साफ नहीं हो सकी। एक समय ऐसा लग रहा था कि भारत के युवा खिलाड़ी यशवीर सिंह पदक की दौड़ से बाहर हो जाएंगे। ग्रेनाडा के पूर्व विश्व चैंपियन एंडरसन पीटर्स तीसरे स्थान पर बने हुए थे और यशवीर चौथे स्थान पर थे।
लेकिन आखिरी थ्रो में यशवीर ने शानदार वापसी की। उन्होंने पूरी ताकत के साथ भाला फेंका, जो 85.41 मीटर की दूरी पर जाकर गिरा। यह उनके करियर का अब तक का सर्वश्रेष्ठ थ्रो साबित हुआ। इस शानदार प्रदर्शन के साथ उन्होंने तीसरा स्थान हासिल कर ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। स्टेडियम तालियों की गूंज से भर उठा और भारत के खाते में जैवलिन थ्रो में दूसरा पदक भी जुड़ गया।यशवीर सिंह की इस उपलब्धि के पीछे वर्षों की मेहनत और उनके पिता का संघर्ष छिपा है। हरियाणा के भिवानी जिले के देवसर गांव में 22 अक्टूबर 2001 को जन्मे यशवीर को खेल की प्रेरणा अपने परिवार से मिली। उनके पिता राय सिंह स्वयं राष्ट्रीय स्तर के जैवलिन थ्रो खिलाड़ी रह चुके हैं और भारतीय रेलवे में कोच के रूप में भी काम कर चुके हैं। अपने खेल जीवन में सही तकनीकी मार्गदर्शन नहीं मिलने का अफसोस उन्हें हमेशा रहा। इसी वजह से उन्होंने तय किया कि अपने बेटे को हर वह अवसर देंगे, जो उन्हें नहीं मिल पाया।
साल 2015 में महज 14 वर्ष की उम्र से ही यशवीर ने अपने पिता की देखरेख में नियमित अभ्यास शुरू किया। रन-अप, ग्रिप, रिलीज और फिटनेस पर लगातार मेहनत की गई। पिता और बेटे की इस जोड़ी ने दिन-रात अभ्यास किया, जिसका परिणाम धीरे-धीरे सामने आने लगा। यशवीर ने अंडर-18 राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार दो बार स्वर्ण पदक जीते और अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।इसके बाद भारतीय अंडर-20 फेडरेशन कप में उन्होंने स्टार एथलीट नीरज चोपड़ा का पुराना मीट रिकॉर्ड तोड़कर सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। वर्ष 2022 में उन्होंने पहली बार 80 मीटर से अधिक दूरी तक भाला फेंका और जून 2026 में 83.72 मीटर का थ्रो कर कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए क्वालीफाई किया।
कॉमनवेल्थ गेम्स में अपने पहले ही प्रयास में पदक जीतना किसी भी खिलाड़ी के लिए बड़ी उपलब्धि होती है। यशवीर सिंह ने न केवल यह सपना पूरा किया, बल्कि अपने पिता की वर्षों पुरानी इच्छा भी साकार कर दी। उनकी सफलता इस बात का प्रमाण है कि सही मार्गदर्शन, अनुशासन और कड़ी मेहनत से बड़े से बड़ा लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।यशवीर सिंह का यह ब्रॉन्ज मेडल भारतीय एथलेटिक्स के लिए एक नई उम्मीद लेकर आया है। नीरज चोपड़ा के साथ पोडियम साझा करने वाले इस युवा खिलाड़ी ने दिखा दिया है कि भारत में जैवलिन थ्रो की नई पीढ़ी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दमदार प्रदर्शन करने के लिए तैयार है। आने वाले वर्षों में उनसे और भी बड़ी उपलब्धियों की उम्मीद की जा रही है।