डिस्कस थ्रो से शुरू हुई लव स्टोरी, पति की कोचिंग में सीमा बनीं CWG मेडलिस्ट

Knews Desk– कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत की महिला डिस्कस थ्रो खिलाड़ी सीमा कालीरमन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक अपने नाम किया। ग्लासगो में खेले जा रहे खेलों के आठवें दिन सीमा ने 58.65 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो कर भारत को एक और पदक दिलाया। खास बात यह रही कि यह उनका पहला कॉमनवेल्थ गेम्स था और उन्होंने अपने डेब्यू में ही पोडियम पर जगह बना ली। खेल के साथ-साथ पढ़ाई और परिवार की जिम्मेदारियां निभाने वाली सीमा की सफलता की कहानी संघर्ष, मेहनत और समर्पण का बेहतरीन उदाहरण है।महिला डिस्कस थ्रो के फाइनल मुकाबले में सीमा का प्रदर्शन उतार-चढ़ाव भरा रहा। उन्होंने कुल छह प्रयास किए, लेकिन उनमें से चार फाउल हो गए। इसके बावजूद उन्होंने अपने दूसरे प्रयास में 57.32 मीटर और तीसरे प्रयास में 58.65 मीटर का थ्रो कर तीसरा स्थान हासिल कर लिया। इसके बाद वह अपनी दूरी में सुधार नहीं कर सकीं, लेकिन अन्य खिलाड़ी भी उन्हें पीछे नहीं छोड़ पाए। इस तरह सीमा ने भारत की झोली में कांस्य पदक डाल दिया। इसी स्पर्धा में भारत की निधि रानी 57.10 मीटर के साथ चौथे स्थान पर रहीं और पदक से मामूली अंतर से चूक गईं।

सीमा की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने खेल के साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। वह स्पोर्ट्स विषय में पीएचडी कर रही हैं और एक शोध छात्रा होने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय एथलीट भी हैं। मैदान के बाहर उनकी पहचान एक मेहनती छात्रा के रूप में है, जबकि मैदान के अंदर वह देश का नाम रोशन कर रही हैं।सीमा की सफलता के पीछे उनके पति रविंदर की अहम भूमिका रही है। रविंदर सिर्फ उनके जीवनसाथी ही नहीं, बल्कि उनके निजी कोच भी हैं। दोनों की मुलाकात डिस्कस थ्रो के कारण हुई थी। रविंदर खुद भी इस खेल के प्रतिभाशाली खिलाड़ी रहे हैं और जूनियर व सब-जूनियर स्तर पर राष्ट्रीय चैंपियन रह चुके हैं। हालांकि चोट के कारण उनका खेल करियर आगे नहीं बढ़ सका। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान सीमा को एक सफल एथलीट बनाने में लगाया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीमा के पिता ने दोनों की शादी का प्रस्ताव इसलिए रखा था ताकि उनकी बेटी को खेल में सही मार्गदर्शन मिल सके। शादी के बाद रविंदर ने सीमा की ट्रेनिंग की जिम्मेदारी संभाली और लगातार उनका हौसला बढ़ाया। कोरोना महामारी के दौरान भी उन्होंने सीमा को खेल के साथ पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया, जिसके बाद सीमा ने स्पोर्ट्स में पीएचडी शुरू की।सीमा के जीवन में एक दौर ऐसा भी आया जब चोट के कारण उन्हें लंबे समय तक मैदान से दूर रहना पड़ा। इसी दौरान उन्होंने बेटे को जन्म दिया। कई लोगों को लगा कि अब उनका खेल करियर शायद आगे नहीं बढ़ पाएगा, लेकिन परिवार के सहयोग और अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर उन्होंने महज 11 महीने बाद फिर से ट्रेनिंग शुरू कर दी। लगातार मेहनत और अनुशासन का ही परिणाम है कि आज वह कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के लिए पदक जीतने वाली एथलीट बन गई हैं।

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में सीमा कालीरमन का यह कांस्य पदक भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि यदि परिवार का साथ, सही मार्गदर्शन और खुद पर भरोसा हो, तो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सफलता हासिल की जा सकती है। एक एथलीट, शोध छात्रा, मां और पत्नी की भूमिका निभाते हुए सीमा ने यह साबित कर दिया कि मेहनत और समर्पण के आगे हर चुनौती छोटी पड़ जाती है।

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