KNEWS DESK- भाद्रपद पूर्णिमा पर भगवान सत्यनारायण और माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन व्रत रखने वालों को सात्विकता, स्वच्छता और धार्मिक नियमों का पालन करने की सलाह दी जाती है।
सनातन धर्म में भाद्रपद पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। वर्ष 2026 में भाद्रपद पूर्णिमा का पर्व आज यानी 26 सितंबर, शनिवार को मनाया जा रहा है। इसी दिन से पितृ पक्ष की शुरुआत भी मानी जा रही है। इस अवसर पर श्रद्धालु भगवान सत्यनारायण और माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं तथा सुख-समृद्धि की कामना के साथ व्रत रखते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूर्णिमा के दिन पूजा-पाठ और व्रत करने से घर में सकारात्मकता और समृद्धि आती है।
भाद्रपद पूर्णिमा के व्रत के दौरान कुछ नियमों का पालन करना जरूरी माना जाता है। मान्यता है कि जाने-अनजाने की गई कुछ गलतियों से व्रत और पूजा का धार्मिक फल प्रभावित हो सकता है। इसलिए इस दिन खान-पान से लेकर व्यवहार और पूजा की स्वच्छता तक विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
भाद्रपद पूर्णिमा के दिन मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन जैसे तामसिक पदार्थों का सेवन करने से बचना चाहिए। व्रत रखने वाले व्यक्ति को पूरे दिन सात्विक भोजन और विचारों का पालन करना चाहिए। इसके साथ ही क्रोध, विवाद और किसी के प्रति द्वेष रखने से भी बचने की मान्यता है। घर के बुजुर्गों, महिलाओं और जरूरतमंद लोगों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। किसी को अपशब्द बोलना या जानबूझकर किसी का मन दुखाना भी इस दिन उचित नहीं माना जाता।
पूर्णिमा के दिन सुबह देर तक सोने के बजाय जल्दी उठकर स्नान करने और स्वच्छ वस्त्र धारण करने की परंपरा है। पूजा के स्थान और घर की साफ-सफाई का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। बिना स्नान किए भोजन बनाने से बचना चाहिए और भोजन की शुद्धता बनाए रखनी चाहिए। घर के मुख्य द्वार को साफ रखने और शाम के समय वहां पर्याप्त प्रकाश रखने की भी धार्मिक मान्यता है।
इस दिन दरवाजे पर आए किसी जरूरतमंद या साधु-संत को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देना शुभ माना जाता है। वहीं पूजा-पाठ केवल दिखावे के लिए करने के बजाय श्रद्धा और भक्ति भाव से करना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा में मन की शुद्धता और श्रद्धा का विशेष महत्व है।
भाद्रपद पूर्णिमा के दिन तुलसी से जुड़े कुछ नियमों का पालन करने की भी मान्यता है। बिना स्नान किए तुलसी के पौधे को स्पर्श करने या उसके पत्ते तोड़ने से बचना चाहिए। शाम या सूर्यास्त के बाद तुलसी दल तोड़ना उचित नहीं माना जाता। तुलसी के पौधे में जरूरत से ज्यादा जल भी नहीं चढ़ाना चाहिए। जल अर्पित करते समय स्वच्छता का ध्यान रखना और तुलसी के पौधे को अनावश्यक रूप से स्पर्श न करना चाहिए।
तुलसी के पत्ते केवल आवश्यकता के अनुसार ही तोड़ने की परंपरा है। पत्ते तोड़ते समय हाथ साफ होने चाहिए और बिना किसी धार्मिक आवश्यकता के तुलसी दल नहीं तोड़ना चाहिए। इस तरह स्वच्छता, सात्विकता, संयम और श्रद्धा के साथ भाद्रपद पूर्णिमा का व्रत और पूजन करने की धार्मिक मान्यता है।