Knews Desk- हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी, पद्मा एकादशी, जलझूलनी एकादशी और डोल ग्यारस के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा के दौरान करवट बदलते हैं। इसी वजह से इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत और दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व को मनाने की परंपराएं भी अलग हैं। कहीं भगवान विष्णु की शोभायात्रा निकाली जाती है तो कहीं उन्हें जल विहार कराया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन कुछ कार्यों को करने से बचना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन बाल और नाखून काटने से परहेज करना चाहिए। बाल धोने की भी मनाही बताई गई है। हालांकि आवश्यकता होने पर कुछ परंपराओं में केवल पानी से बाल धोने की बात कही जाती है।एकादशी व्रत के दौरान घर में पोछा लगाने और कपड़े धोने से भी बचने की मान्यता है। व्रत रखने वाले लोगों को चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। कुछ धार्मिक परंपराओं में समा के चावल को भी व्रत के दौरान न खाने की सलाह दी जाती है।जो लोग एकादशी का व्रत नहीं रखते हैं, उन्हें भी इस दिन सात्विक भोजन करने और मांसाहार तथा अन्य तामसिक चीजों से बचने की सलाह दी जाती है।
पंचांग के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी की तिथि 22 सितंबर 2026 की रात 9:43 बजे समाप्त होगी। इसके बाद द्वादशी तिथि शुरू होगी। व्रत का पारण 23 सितंबर 2026, बुधवार को सुबह 6:10 बजे से 8:35 बजे के बीच किया जाएगा। हालांकि, पारण का समय स्थान के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है। इसलिए व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग के अनुसार समय देखना उचित माना जाता है।पौराणिक कथा के अनुसार एक बार राजा मान्धाता के राज्य में लगातार तीन वर्षों तक बारिश नहीं हुई। बारिश न होने के कारण प्रजा परेशान हो गई और राज्य में अकाल जैसी स्थिति पैदा हो गई। प्रजा राजा के पास पहुंची और इस समस्या का समाधान निकालने की मांग की।
राजा मान्धाता इसका कारण जानने के लिए जंगल की ओर गए। वहां उन्हें एक ऋषि के दर्शन हुए। राजा ने उनसे राज्य में बारिश नहीं होने का कारण पूछा। ऋषि ने उन्हें भाद्रपद शुक्ल पक्ष की परिवर्तिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।राजा ने वापस लौटकर अपनी प्रजा और परिवार के साथ एकादशी का व्रत रखा और भगवान विष्णु की पूजा की। कथा के अनुसार व्रत के प्रभाव से राज्य में बारिश हुई और सूखे की स्थिति समाप्त हो गई। इसके बाद प्रजा फिर से सुखी हो गई।
कथा में इस एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा के साथ दान करने का भी महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जल से भरा घड़ा, दही, चावल, छाता और जूते आदि का दान करने से पुण्य प्राप्त होता है।धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में परिवर्तिनी एकादशी को भगवान विष्णु की आराधना के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसके नियम और पूजा-विधि में अंतर हो सकता है। इसलिए व्रत रखने वाले श्रद्धालु स्थानीय पंचांग और अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा-विधि अपना सकते हैं।