Aja Ekadashi 2026: अजा एकादशी पर क्यों करें हृषिकेश नारायण की पूजा? जानें ऋषिकेश से जुड़ी पौराणिक कहानी

KNEWS DESK- भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है. इस दिन विष्णु जी के हृषिकेश स्वरूप की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है. हृषिकेश नाम का संबंध ऋषिकेश नगरी और रैभ्य ऋषि की कठोर तपस्या से भी जोड़ा जाता है. जानिए इस स्वरूप की कथा और अजा एकादशी पर पूजा की सही विधि.

हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है. साल 2026 में अजा एकादशी का व्रत 7 सितंबर को रखा जाएगा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन उपवास और भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है और भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है.

अजा एकादशी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा तो की ही जाती है, लेकिन इस दिन हृषिकेश स्वरूप की आराधना का भी विशेष महत्व बताया गया है. आखिर भगवान विष्णु का यह स्वरूप क्या है और इसका ऋषिकेश नगरी से क्या संबंध है?

क्या है भगवान विष्णु का हृषिकेश स्वरूप?

‘हृषिकेश’ संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना माना जाता है- ‘हृषिक’ और ‘ईश’. यहां हृषिक का अर्थ इंद्रियों से और ईश का अर्थ स्वामी या अधिपति से लिया जाता है. इस तरह हृषिकेश का अर्थ हुआ इंद्रियों के स्वामी. भगवान विष्णु के इस स्वरूप को मनुष्य की इंद्रियों पर नियंत्रण और आत्मसंयम का प्रतीक माना जाता है. यही वजह है कि अजा एकादशी जैसे आध्यात्मिक पर्व पर हृषिकेश स्वरूप की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है.

हृषिकेश स्वरूप की पौराणिक कथा रैभ्य ऋषि से जुड़ी बताई जाती है. मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में रैभ्य ऋषि ने गंगा के तट पर भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की थी.ऋषि का उद्देश्य भगवान के दर्शन प्राप्त करना और अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करना था. उन्होंने लंबे समय तक कठोर साधना और भगवान विष्णु की आराधना की. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए. कहा जाता है कि भगवान ने रैभ्य ऋषि को हृषिकेश स्वरूप में दर्शन दिए. ऋषि ने भगवान से वरदान मांगा कि वे इसी पवित्र स्थान पर निवास करें, ताकि भविष्य में यहां आने वाले भक्त भी उनके दर्शन कर सकें और उनकी कृपा प्राप्त कर सकें. भगवान विष्णु ने ऋषि की प्रार्थना स्वीकार कर ली. इसी वजह से इस स्थान को भगवान के हृषिकेश स्वरूप से जोड़कर देखा जाता है.

ऋषिकेश नगरी के नाम को लेकर भी एक पौराणिक मान्यता प्रचलित है. स्कंद पुराण से जुड़ी मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने रैभ्य ऋषि को एक झुके हुए आम के पेड़ के नीचे दर्शन दिए थे. इस स्थान को कुब्जाम्रक के नाम से भी जाना गया. भगवान के हृषिकेश स्वरूप में प्रकट होने की कथा के कारण आगे चलकर यह क्षेत्र हृषिकेश और फिर ऋषिकेश के नाम से प्रसिद्ध हुआ, ऐसी धार्मिक मान्यता है. इस तरह ऋषिकेश को केवल गंगा तट की आध्यात्मिक नगरी ही नहीं, बल्कि भगवान विष्णु के हृषिकेश स्वरूप और रैभ्य ऋषि की साधना से जुड़ा पवित्र स्थान भी माना जाता है.

ऋषिकेश स्थित श्री भरत मंदिर का संबंध भी भगवान हृषिकेश नारायण की इसी परंपरा से जोड़ा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, मंदिर में भगवान विष्णु के चार भुजाओं वाले स्वरूप की पूजा की जाती है. इसी कारण ऋषिकेश आने वाले श्रद्धालुओं के लिए श्री भरत मंदिर का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है. भगवान के हृषिकेश नारायण स्वरूप की आराधना को आत्मसंयम और आध्यात्मिक उन्नति से जोड़कर देखा जाता है.

अजा एकादशी पर कैसे करें भगवान विष्णु की पूजा?

अजा एकादशी के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और भगवान विष्णु की पूजा का संकल्प लें. इसके बाद पूजा स्थल पर चौकी रखकर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें.

पूजा में भगवान विष्णु को पीले फूल, फल और तुलसी दल अर्पित कर सकते हैं. धार्मिक मान्यता में तुलसी को भगवान विष्णु का प्रिय माना गया है. इसके बाद धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करके भगवान की आरती करें.

भोग में केसर की खीर, पंजीरी या अपनी श्रद्धा के अनुसार सात्विक प्रसाद चढ़ाया जा सकता है. पूजा के दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करना भी शुभ माना जाता है.

अजा एकादशी पर हृषिकेश स्वरूप की पूजा का संदेश

अजा एकादशी पर हृषिकेश स्वरूप की पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं मानी जाती. भगवान के इस स्वरूप का संबंध इंद्रियों पर नियंत्रण से है. इसलिए यह दिन संयम, भक्ति और आत्मचिंतन के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धा और नियमपूर्वक अजा एकादशी का व्रत रखने तथा भगवान विष्णु की आराधना करने से पापों से मुक्ति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति हो सकती है. हालांकि पूजा-पाठ और व्रत की परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकती हैं, इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार अनुष्ठान करना उचित माना जाता है.

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