उज्जैन में 2100 साल पुरानी नगर पूजा का आगाज, महाअष्टमी पर महामाया-महालया को मदिरा अर्पित कर निभाई गई परंपरा

KNEWS DESK- मध्य प्रदेश के उज्जैन में शारदीय नवरात्र की महाअष्टमी पर ऐतिहासिक नगर पूजा की शुरुआत हो गई। करीब 2100 साल पुरानी मानी जाने वाली इस परंपरा के तहत सोमवार सुबह चौबीस खंबा माता मंदिर में माता महामाया और महालया को मदिरा अर्पित कर अनुष्ठान किया गया। इसके बाद शहर के विभिन्न हिस्सों में स्थित देवी, भैरव और हनुमान मंदिरों में पूजा-अर्चना के लिए प्रशासनिक अधिकारियों और कोटवारों का दल रवाना हुआ। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष पूजा का उद्देश्य नगर में सुख, शांति और समृद्धि बनाए रखना है।

चौबीस खंबा माता मंदिर से शुरू हुई नगर पूजा

उज्जैन में नगर पूजा की शुरुआत सोमवार सुबह करीब 8 बजे चौबीस खंबा माता मंदिर में हुई। यहां माता महामाया और महालया को मदिरा का भोग अर्पित किया गया। इस दौरान कलेक्टर रोशन कुमार सिंह, एसपी प्रदीप शर्मा समेत अन्य प्रशासनिक अधिकारियों ने विधि-विधान से पूजा संपन्न कराई। अनुष्ठान के बाद अधिकारियों और कोटवारों का दल नगर के अलग-अलग मंदिरों में पूजा करने के लिए रवाना हुआ। यह परंपरा केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर के व्यापक क्षेत्र में स्थित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर इसे निभाया जाता है।

उज्जैन की नगर पूजा अपने व्यापक स्वरूप के लिए जानी जाती है। इस परंपरा के तहत करीब 27 किलोमीटर लंबे मार्ग पर स्थित 40 से अधिक देवी, भैरव और हनुमान मंदिरों में पूजा-अर्चना की जाती है। इस आयोजन में 25 लीटर से अधिक मदिरा के इस्तेमाल की जानकारी दी गई है। पूजा के दौरान स्थानीय धार्मिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग विधियों का पालन किया जाता है। देवी और भैरव मंदिरों में मदिरा अर्पित की जाती है, जबकि हनुमान मंदिरों में अलग प्रकार की पूजन सामग्री चढ़ाई जाती है।

देवी-भैरव को मदिरा, हनुमान मंदिरों में नारियल और सिंदूर

चौबीस खंबा माता मंदिर के पुजारी महेश गुरु के अनुसार, नगर पूजा के दौरान देवी और भैरव मंदिरों में मदिरा के साथ दही, पूड़ी, भजिए और भीगे हुए गेहूं-चने से तैयार घूघरी का भोग लगाया जाता है। वहीं, हनुमान मंदिरों में नारियल, तेल, सिंदूर और ध्वज अर्पित करने की परंपरा है। इस तरह नगर पूजा में अलग-अलग देवी-देवताओं के अनुसार पूजन विधियां अपनाई जाती हैं।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अनुष्ठान से नगर में मौजूद अतृप्त आत्माओं को तृप्ति मिलती है। मान्यता है कि इससे नगरवासियों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

सम्राट विक्रमादित्य के समय से जुड़ी है परंपरा

उज्जैन की नगर पूजा को ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व दिया जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, करीब 2100 साल पुरानी इस परंपरा की शुरुआत सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल में हुई थी। समय बीतने के साथ यह परंपरा सिंधिया स्टेट के दौर में भी जारी रही। देश की आजादी के बाद से प्रदेश शासन और प्रशासन की ओर से इस अनुष्ठान का निर्वहन किया जाता रहा है। नगर पूजा का खर्च शासन और संबंधित अधिकारियों की ओर से वहन किया जाता है।

उज्जैन की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा

महाअष्टमी पर होने वाली नगर पूजा उज्जैन की प्राचीन धार्मिक परंपराओं में से एक मानी जाती है। इस आयोजन में प्रशासनिक अधिकारियों की भागीदारी और शहर के कई मंदिरों में एक साथ पूजा-अर्चना की परंपरा इसे विशिष्ट बनाती है।

आज भी यह अनुष्ठान स्थानीय आस्था और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा हुआ है। नवरात्र के दौरान होने वाली इस पूजा को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह रहता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, नगर पूजा के माध्यम से उज्जैन की खुशहाली, शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।

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