धाम में डीजे की धमक,दिल्ली तक खनक !

उत्तराखंड डेस्क रिपोर्ट, उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ अध्यात्म और धार्मिक आस्था के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है, यही वजह है कि इसे देवभूमि कहा जाता है। राज्य सरकार विकास के साथ-साथ देवभूमि की धार्मिक गरिमा बनाए रखने का दावा करती रही है। बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री जैसे चार धाम इसी विरासत का अहम हिस्सा हैं, जहां हर साल लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन आस्था के ये केंद्र कभी कभी अलग वजहों से चर्चा में आ जाते हैं। इस वर्ष बैकुंठ धाम बद्रीनाथ से जुड़े कुछ विवादों ने सियासत गरमा दी है। पहले दान से जुड़े मामले पर सवाल उठे और अब बद्रीनाथ मंदिर के समीप DJ और तेज संगीत का मामला सुर्खियों में है। दरअसल, 19 और 20 सितंबर को देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल आयोजित हुआ था। कार्यक्रम का आयोजन सेना की ऑपरेशन सद्भावना पहल के तहत चमोली जिला प्रशासन और उत्तराखंड पर्यटन के सहयोग से किया गया था। मकसद सीमांत क्षेत्रों में पर्यटन और संस्कृति को बढ़ावा देना था। लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में तेज आवाज में DJ और लोगों के नाचने के दृश्य सामने आए। मान्यता है कि बद्रीनाथ धाम में शंख भी नहीं बजाया जाता, ऐसे में तेज़ ध्वनि DJ पर संत समाज और तीर्थ पुरोहितों ने आपत्ति जताई है, और विपक्ष ने सरकार को घेरा है, यहाँ तक कि पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने भी ऐसे आयोजनों में सावधानी बरतने की अपील की है। इस सबके बीच यह मामला अब सियासती तूल भी पकड़ चुका है, जिसके चलते आपसी बयानबाज़ी देखी जा रही है।

देवभूमि उत्तराखंड जहां आस्था, परंपरा और धार्मिक मान्यताओं की अपनी एक अलग पहचान है। जहां बद्रीनाथ धाम जैसे तीर्थस्थल करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। लेकिन अब इसी बद्रीनाथ धाम से जुड़ा एक वीडियो सियासी बहस का नया मुद्दा बन गया है। मामला है बद्रीनाथ मंदिर के समीप आयोजित देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल का। बीते 19 और 20 सितंबर को हुए इस आयोजन के कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए, जिनमें तेज संगीत और लोगों के नाचने के दृश्य दिखाई दिए। वीडियो सामने आने के बाद सवाल उठने लगे कि क्या बद्रीनाथ जैसे धार्मिक स्थल के आसपास ऐसे आयोजनों में तेज संगीत और डीजे उचित है जहाँ पौराणिक काल से शंख तक नहीं बजाया जाता हैं। मान्यताओं के मुताबिक बद्रीनाथ धाम की धार्मिक मर्यादा और शांत वातावरण का विशेष महत्व है। ऐसे में पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी सहित संतों और तीर्थ पुरोहितों ने आयोजन को लेकर आपत्ति जताई है। वही मामला अब धार्मिक मर्यादा से निकलकर सियासी गलियारों तक पहुंच चुका है। विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया है, जिसपर सत्ता पक्ष सफाई देता नज़र आ रहा हैं।

कुल मिलाकर, बद्रीनाथ धाम के समीप आयोजित देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल का मामला अब सिर्फ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह देवभूमि की धार्मिक पहचान, आस्था और मर्यादा से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है। एक तरफ सरकार और प्रशासन का तर्क है कि सीमांत क्षेत्रों में पर्यटन और स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए ऐसे आयोजनों की जरूरत है। तो दूसरी तरफ संत समाज, तीर्थ पुरोहित और श्रद्धालुओं का मानना है कि बद्रीनाथ जैसे धाम की पवित्रता और शांत वातावरण से किसी भी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए। अब देखना होगा कि सरकार इस विवाद के बाद धार्मिक स्थलों के आसपास होने वाले आयोजनों के लिए कोई स्पष्ट गाइडलाइन तय करती है या नहीं। क्योंकि देवभूमि में विकास और आस्था के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है और बद्रीनाथ का यह विवाद उसी संतुलन की परीक्षा बन गया है।

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