KNews Desk: मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में सरदार सरोवर बांध से प्रभावित विस्थापित परिवारों की मुश्किलें ढाई दशक बाद भी खत्म नहीं हुई हैं। नर्मदा नदी में गांव और घर डूबने के 25 साल बाद भी कई परिवार अपने पुनर्वास और मुआवजे के हक के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं। प्रभावितों का आरोप है कि राहत और पुनर्वास देने के बजाय उन्हें कागजी औपचारिकताओं और नए-नए नियमों में उलझाया जा रहा है।
सबसे हैरान करने वाला मामला सनगांव के डूब प्रभावित राधेश्याम का है। मां के निधन के बाद उनके 60 लाख रुपये के पुनर्वास पैकेज में से 54 लाख रुपये अभी बाकी हैं। उन्हें पहले 6 लाख रुपये मिल चुके हैं। राधेश्याम के पास वर्ष 1986 की मार्कशीट, नगर पालिका की टैक्स रसीद, रजिस्टर्ड गोदनामा और तहसीलदार की ओर से जारी कब्जा प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज मौजूद हैं।
इसके बावजूद शिकायत निवारण प्राधिकरण (GRA) की ओर से वारिस प्रमाण पत्र मांगा गया। स्थानीय तहसीलदार ने इसके लिए ऐसे गांव के सचिव से रिपोर्ट लाने की शर्त रख दी, जो सरदार सरोवर बांध की डूब में आने के बाद पूरी तरह खाली हो चुका है। गांव में अब कोई आबादी नहीं है। ऐसे में सचिव का कहना है कि जब गांव ही अस्तित्व में नहीं है और वहां कोई व्यक्ति रह नहीं रहा, तो रिपोर्ट कैसे जारी की जाए।
गुजरात में मिली जमीन, लेकिन नहीं मिला पुनर्वास का पूरा हक
ग्राम कुकरा के हिम्मत सिंह का मामला भी सरकारी प्रक्रिया की पेचीदगियों को उजागर करता है। उन्हें वर्ष 2001-02 में गुजरात के भरूच में जमीन आवंटित की गई थी। जमीन पर कब्जा नहीं मिलने के कारण वर्ष 2012 में बड़ोदरा के सहायक आयुक्त ने आवंटन रद्द कर मध्य प्रदेश में ही पुनर्वास की सिफारिश की थी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक 2 हेक्टेयर जमीन के बदले 60 लाख रुपये का विशेष पुनर्वास पैकेज दिया जाना था। हालांकि, नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (NVDA) ने दोहरी राहत का हवाला देते हुए भुगतान रोक रखा है। हिम्मत सिंह का कहना है कि उन्हें उनका निर्धारित हक अब तक नहीं मिला है।
खारी जमीन ने 22 परिवारों की जिंदगी की मुश्किल
ग्राम कुकरा राजघाट के बहादुर सिंह, बाबू सिंह और कनक सिंह सहित 22 परिवारों की कहानी भी कुछ अलग नहीं है। वर्ष 2001 में इन परिवारों को गुजरात के केसरोल (भूखी खाड़ी) में समुद्र के पास जमीन दी गई थी। लेकिन जमीन में खारे पानी की वजह से खेती बर्बाद हो गई और परिवारों के लिए वहां जीवन-यापन करना मुश्किल हो गया।
वर्ष 2008 में ग्राम सभा ने जमीन का आवंटन निरस्त कर दिया। इसके बाद सभी 22 परिवार मध्य प्रदेश वापस लौट आए। फिलहाल ये परिवार मजदूरी करके अपना जीवन चला रहे हैं। प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्हें भी अब तक 60 लाख रुपये का विशेष पुनर्वास पैकेज नहीं मिला है।
विस्थापितों ने कलेक्टर और GRA से लगाई गुहार
विस्थापित परिवारों ने बड़वानी कलेक्टर और GRA इंदौर के सामने अपनी समस्याएं रखी हैं। उनकी मांग है कि वर्षों से चले आ रहे कागजी विवादों को खत्म किया जाए, गुजरात में दी गई अनुपयोगी खारी जमीनों के पट्टे निरस्त किए जाएं और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार पात्र परिवारों को 60-60 लाख रुपये का विशेष पुनर्वास अनुदान जल्द जारी किया जाए।
SDM ने बताई प्रमाण पत्र की जरूरत
मामले पर बड़वानी के SDM भूपेंद्र रावत ने कहा कि दत्तक पुत्र के मामले में नियमों के अनुसार सिविल कोर्ट से विधिक उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना जरूरी है। कोर्ट का प्रमाण पत्र मिलने के बाद नियमानुसार भुगतान की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि दूसरे लंबित मामलों की फाइलों की जांच कराकर नियमानुसार उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
सरदार सरोवर बांध के लिए अपना घर, जमीन और गांव छोड़ने वाले इन परिवारों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर 25 साल बाद भी उनका पुनर्वास और मुआवजे का इंतजार कब खत्म होगा?