KNEWS DESK- मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले के मगनिया गांव की 18 वर्षीय आकांक्षा चतुर्वेदी ने NEET परीक्षा रद्द होने की अनिश्चितता और दोबारा परीक्षा देने की हिम्मत न रहने के कारण कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। परीक्षा के बाद अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद रखने वाली इस छात्रा की मौत ने न केवल परिवार को सदमे में डुबो दिया है, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों छात्रों पर पड़ रहे मानसिक दबाव और परीक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
आकांक्षा का परिवार मूल रूप से मगनिया गांव का रहने वाला है। बेहतर शिक्षा और NEET की तैयारी के लिए वे पिछले कुछ समय से नागपुर में रह रहे थे। पिता कृष्ण कुमार चौबे किसान हैं, लेकिन बेटी के सपने को पूरा करने के लिए नागपुर में कुक का काम भी कर रहे थे। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार ने बेटी की पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी। किसान क्रेडिट कार्ड से लगभग तीन लाख रुपये का कर्ज लिया गया और रिश्तेदारों से भी मदद मांगी गई।
परिवार के अनुसार, आकांक्षा ने NEET की तैयारी के लिए नागपुर में कोचिंग जॉइन की थी और पूरी मेहनत से पढ़ाई की। परीक्षा देने के बाद वह अपने प्रदर्शन से संतुष्ट थी और उसे इस बार चयन होने का भरोसा था। लेकिन परीक्षा रद्द होने की खबरों और लगातार विवादों ने उसे गहरे मानसिक तनाव में डाल दिया। वह लगातार परेशान रहने लगी थी।
आकांक्षा ने अपने कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। घटना के बाद कमरे से बरामद सुसाइड नोट में उसने माता-पिता से माफी मांगी। नोट में लिखा था, “आप लोगों को भरोसा था कि मैं डॉक्टर बनूंगी, लेकिन अब दोबारा NEET देने की हिम्मत नहीं बची है। पहले परीक्षा में अच्छे अंक आने की उम्मीद थी, लेकिन भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं हूं।”
परिवार इस सदमे से उबर नहीं पा रहा है। आकांक्षा की मौत के बाद राजनीतिक गतिविधियां भी तेज हो गई हैं। कांग्रेस और संबंधित संगठनों के नेताओं ने परिवार से मुलाकात कर संवेदना व्यक्त की। पार्टी की ओर से 2.5 लाख रुपये की आर्थिक मदद पहुंचाई गई है साथ ही कर्ज चुकाने में सहयोग का आश्वासन भी दिया गया है।
विपक्षी नेताओं ने इस घटना को युवाओं पर बढ़ते दबाव, आर्थिक बोझ और परीक्षा प्रणाली की खामियों से जोड़ा है। उन्होंने सरकार से जवाबदेही तय करने की मांग की है। परिवार न्याय और पारदर्शी जांच की मांग कर रहा है।
यह घटना एक बार फिर से NEET जैसी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी चुनौतियों को रेखांकित करती है — जहां लाखों छात्र वर्षों की मेहनत, परिवार की आर्थिक कुर्बानी और भविष्य की उम्मीदों के साथ परीक्षा देते हैं। परीक्षा में रद्दीकरण, विवाद और अनिश्चितता का छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ रहा है, यह सवाल अब समाज और नीति-निर्माताओं के सामने है।
आकांक्षा चतुर्वेदी की कहानी सिर्फ एक परिवार की ट्रेजेडी नहीं, बल्कि हजारों आकांक्षी छात्रों की पीड़ा की प्रतीक बन गई है, जो सपनों को हकीकत बनाने की लड़ाई में खुद को खोते जा रहे हैं।