तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा व्यवस्था में बड़े बदलाव की मांग की है। उन्होंने UN के स्थायी सदस्यों को मिले वीटो के विशेष अधिकार को खत्म करने की बात कही है। एर्दोगन का कहना है कि दुनिया काफी बदल चुकी है, लेकिन UN की व्यवस्था अभी भी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के दौर के मुताबिक चल रही है।
Knews Desk- एर्दोगन ने ब्लूमबर्ग में प्रकाशित अपने एक लेख में UN की निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कई बड़े संकट और त्रासदियां देखी हैं। इन घटनाओं ने यह दिखाया है कि वैश्विक समस्याओं का समाधान कुछ चुनिंदा देशों की राजधानियों में लिए गए फैसलों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। उनके मुताबिक UN को मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप अपनी व्यवस्था में सुधार करने की जरूरत है।
एर्दोगन का कहना है कि किसी एक देश के पास ऐसा विशेष अधिकार नहीं होना चाहिए, जिसके जरिए वह दुनिया के अधिकांश देशों की इच्छा के बावजूद किसी फैसले को रोक सके। उन्होंने वीटो पावर को खत्म करने को UN में सुधार की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक बताया। उनका जोर ऐसी व्यवस्था बनाने पर है, जो ज्यादा प्रभावी, समान और जवाबदेह हो।
वर्तमान में UN सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्य हैं और इन्हें वीटो पावर हासिल है। आसान शब्दों में समझें तो सुरक्षा परिषद के किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर इन पांच देशों में से कोई एक देश विरोध करता है, तो वह प्रस्ताव पारित होने से रुक सकता है। एर्दोगन इसी विशेष अधिकार को खत्म करने की मांग कर रहे हैं।
तुर्की के राष्ट्रपति ने सुरक्षा परिषद और UN महासभा के बीच शक्ति संतुलन को बेहतर करने की जरूरत पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि सुरक्षा परिषद में दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों और देशों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए और निर्णय लेने की प्रक्रिया मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप होनी चाहिए।
एर्दोगन ने UN महासभा में विभिन्न देशों को साथ लाकर एक बड़े गठबंधन की जरूरत की बात भी कही है। उनका मानना है कि देशों को मिलकर ऐसी व्यवस्था के लिए काम करना चाहिए, जिसमें किसी एक देश के पास बाकी देशों के बहुमत के फैसले को रोकने की स्थायी शक्ति न हो।
UN सुरक्षा परिषद की वीटो व्यवस्था को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। इस साल जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल ने भी वीटो के कारण सुरक्षा परिषद में निर्णय लेने में आने वाली मुश्किलों की आलोचना की थी। अब एर्दोगन की मांग के बाद एक बार फिर UN की मौजूदा व्यवस्था और वीटो पावर को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
हालांकि, वीटो पावर को खत्म करना आसान नहीं होगा। इसके लिए UN की मौजूदा व्यवस्था में बड़े स्तर पर बदलाव करने की जरूरत होगी।