दिल्ली मेट्रो के पीछे जापान का सबसे बड़ा योगदान, PM ताकाइची के दौरे के बीच जानिए पूरी कहानी

Knews Desk- जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची इन दिनों भारत के दौरे पर हैं। भारत और जापान के बीच दशकों पुराने मजबूत रिश्तों की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। इन रिश्तों की सबसे बड़ी मिसालों में से एक है दिल्ली मेट्रो, जिसने राजधानी की तस्वीर और लोगों के सफर का तरीका पूरी तरह बदल दिया। कम लोग जानते हैं कि दिल्ली मेट्रो को साकार करने में जापान की आर्थिक, तकनीकी और संस्थागत मदद ने बेहद अहम भूमिका निभाई थी।

1990 के दशक में दिल्ली तेजी से बढ़ती आबादी, ट्रैफिक जाम और प्रदूषण जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही थी। सार्वजनिक परिवहन का मुख्य साधन बसें थीं, जो बढ़ती मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं थीं। ऐसे में राजधानी के लिए आधुनिक मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम यानी मेट्रो रेल की योजना बनाई गई। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए भारत को एक भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय साझेदार की जरूरत थी और जापान इस मिशन में सबसे आगे आया।दिल्ली मेट्रो परियोजना को लागू करने के लिए 3 मई 1995 को दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) का गठन किया गया। यह केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार का संयुक्त उपक्रम है। इसके बाद परियोजना की विस्तृत योजना तैयार की गई और जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (JICA) ने शुरुआती अध्ययन, तकनीकी सलाह और परियोजना की व्यवहार्यता का आकलन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

दिल्ली मेट्रो का निर्माण कार्य 1 अक्टूबर 1998 को औपचारिक रूप से शुरू हुआ। इस परियोजना का नेतृत्व भारत के “मेट्रो मैन” कहे जाने वाले ई. श्रीधरन ने किया। उनके नेतृत्व में भारतीय और जापानी इंजीनियरों ने मिलकर समयबद्ध तरीके से परियोजना को आगे बढ़ाया। दिसंबर 2002 में दिल्ली मेट्रो का पहला कॉरिडोर आम जनता के लिए शुरू कर दिया गया, जिसने भारत में आधुनिक शहरी परिवहन के एक नए दौर की शुरुआत की।दिल्ली मेट्रो की सबसे बड़ी ताकत जापान की ओर से मिला सॉफ्ट लोन (रियायती कर्ज) था। जापान ने इस परियोजना के लिए बेहद कम ब्याज दर पर लंबी अवधि का ऋण उपलब्ध कराया। इस कर्ज की शर्तें भी काफी आसान थीं, जिससे भारत पर वित्तीय बोझ नहीं पड़ा। यही वजह रही कि दिल्ली मेट्रो का निर्माण बिना किसी बड़े आर्थिक संकट के चरणबद्ध तरीके से पूरा होता गया।

आर्थिक सहायता के अलावा जापान ने तकनीकी विशेषज्ञता भी उपलब्ध कराई। सिग्नलिंग सिस्टम, सुरक्षा मानकों, ट्रेन संचालन, निर्माण तकनीक और परियोजना प्रबंधन जैसे कई क्षेत्रों में जापानी अनुभव का लाभ मिला। इसके साथ ही भारतीय इंजीनियरों और अधिकारियों को प्रशिक्षण भी दिया गया, जिससे देश में मेट्रो परियोजनाओं के लिए मजबूत तकनीकी क्षमता विकसित हुई।दिल्ली मेट्रो की सफलता के बाद जापान ने भारत के अन्य मेट्रो प्रोजेक्ट्स में भी सहयोग जारी रखा। आज मुंबई, चेन्नई, अहमदाबाद और बेंगलुरु समेत कई शहरों की मेट्रो परियोजनाओं में भी जापानी वित्तीय और तकनीकी सहयोग देखने को मिलता है। इससे भारत में आधुनिक शहरी परिवहन नेटवर्क के विस्तार को गति मिली है।

आज दिल्ली मेट्रो का नेटवर्क करीब 416 किलोमीटर तक फैल चुका है। 300 से अधिक स्टेशनों वाला यह नेटवर्क रोजाना 65 से 70 लाख यात्रियों को सुरक्षित, तेज और सुविधाजनक यात्रा का विकल्प उपलब्ध कराता है। यह सिर्फ एक परिवहन व्यवस्था नहीं, बल्कि भारत-जापान की मजबूत रणनीतिक साझेदारी और भरोसे की भी प्रतीक बन चुकी है।प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के भारत दौरे के बीच दिल्ली मेट्रो की यह कहानी दोनों देशों के रिश्तों की गहराई को फिर से याद दिलाती है। यह परियोजना दिखाती है कि मजबूत अंतरराष्ट्रीय सहयोग, दूरदर्शी योजना और तकनीकी साझेदारी से किस तरह किसी शहर की पहचान बदली जा सकती है।

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