Knews Desk- पश्चिम बंगाल में लागू हुए नए वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज़ एक्ट, 2026 (गुंडा दमन कानून) को लेकर राज्य में सियासी और कानूनी बहस तेज हो गई है। राज्य सरकार का कहना है कि यह कानून संगठित अपराध, सिंडिकेट राज, रंगदारी, अवैध खनन, तस्करी और हिंसक गिरोहों पर लगाम लगाने के लिए बनाया गया है। वहीं, विपक्ष और कई कानूनी विशेषज्ञ इसे नागरिक स्वतंत्रता के लिए खतरा बताते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंच गए हैं। कानून लागू होने के तुरंत बाद इसके खिलाफ जनहित याचिका दायर की गई, हालांकि फिलहाल हाईकोर्ट ने इस पर कोई अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया है।
यह कानून जून 2026 के अंत में पश्चिम बंगाल विधानसभा से पारित हुआ था और 13 जुलाई 2026 से पूरे राज्य में प्रभावी हो गया। सरकार का दावा है कि राज्य में बढ़ते संगठित अपराध और सार्वजनिक व्यवस्था को चुनौती देने वाली गतिविधियों पर सख्ती से अंकुश लगाने के लिए यह कानून जरूरी था।इस कानून की सबसे चर्चित और विवादित व्यवस्था प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक हिरासत) है। इसके तहत यदि प्रशासन को यह आशंका हो कि कोई व्यक्ति भविष्य में गंभीर समाज विरोधी गतिविधि कर सकता है, तो उसे अपराध होने से पहले ही हिरासत में लिया जा सकता है। ऐसे व्यक्ति को अधिकतम 12 महीने तक बिना नियमित आपराधिक मुकदमे के हिरासत में रखा जा सकता है। सरकार का कहना है कि अपराध होने के बाद कार्रवाई करने से बेहतर है कि संभावित अपराध को पहले ही रोका जाए। वहीं आलोचकों का तर्क है कि केवल आशंका के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनना संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के खिलाफ हो सकता है।
कानून के तहत “समाज विरोधी गतिविधि” की परिभाषा भी काफी व्यापक रखी गई है। इसमें रंगदारी, गैंग गतिविधियां, सार्वजनिक शांति भंग करना, हिंसक प्रदर्शन, दंगा, आगजनी, सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, अवैध खनन, बालू तस्करी, जंगल संपदा की चोरी और लोगों को उनके वैध व्यवसाय या संपत्ति से जबरन बेदखल करना जैसी गतिविधियां शामिल हैं। इतना ही नहीं, अपराध की योजना बनाने, आर्थिक मदद देने या अपराध को बढ़ावा देने वाले लोगों को भी इस कानून के दायरे में लाया जा सकता है।
इस कानून के तहत जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस आयुक्त और डीआईजी स्तर के अधिकारियों को कार्रवाई शुरू करने का अधिकार दिया गया है। यदि संबंधित अधिकारी को लगता है कि किसी व्यक्ति की गतिविधियों से कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है, तो उसके खिलाफ आदेश जारी किया जा सकता है। इसी प्रावधान को लेकर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि आलोचकों का कहना है कि अधिकारियों के विवेकाधिकार का दुरुपयोग होने की आशंका बनी रहेगी।कानून में एक्सटर्नमेंट (क्षेत्र से निष्कासन) का भी प्रावधान है। इसके तहत किसी व्यक्ति को अधिकतम एक वर्ष तक किसी जिले, शहर या विशेष इलाके में प्रवेश करने से रोका जा सकता है। ऐसे व्यक्ति को समय-समय पर पुलिस के सामने हाजिरी भी देनी पड़ सकती है। सरकार का कहना है कि इससे स्थानीय गैंग और दबंगों के प्रभाव को खत्म करने में मदद मिलेगी।
इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति कानून हाथ में लेकर हिंसा, तोड़फोड़ या संगठित अपराध में शामिल पाया जाता है, तो उसकी संपत्ति जब्त करने की कार्रवाई भी की जा सकती है। सरकार इसे अपराधियों के आर्थिक नेटवर्क को तोड़ने का प्रभावी हथियार मान रही है।दूसरी ओर, कानून के खिलाफ दायर जनहित याचिका में इसे संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून पुलिस और प्रशासन को अत्यधिक अधिकार देता है, जिससे निर्दोष लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की आशंका बढ़ सकती है। फिलहाल मामला कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित है और आने वाले दिनों में इस कानून की संवैधानिक वैधता पर अहम कानूनी बहस देखने को मिल सकती है।