नाबालिगों की ड्राइविंग बनी बड़ी चुनौती, एक साल में 11,890 सड़क हादसे

Knews Desk- भारत में नाबालिगों का वाहन चलाना सड़क सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता बनता जा रहा है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में नाबालिगों से जुड़े 11,890 सड़क हादसे दर्ज किए गए। यानी औसतन हर दिन करीब 16 दुर्घटनाएं हुईं।

नाबालिगों की ड्राइविंग से जुड़े मामलों में तमिलनाडु सबसे आगे रहा, जहां 2,063 हादसे दर्ज किए गए। इसके बाद मध्य प्रदेश में 1,138 मामले सामने आए। वहीं, दिल्ली में भी बिना लाइसेंस वाहन चलाने वाले नाबालिगों के खिलाफ कार्रवाई के मामले बढ़े हैं।

नाबालिगों की ड्राइविंग का मुद्दा कर्नाटक हाईकोर्ट में चल रहे एक मामले के बाद फिर चर्चा में है। मामला 2020 के एक सड़क हादसे से जुड़ा है, जिसमें कथित तौर पर 14 वर्षीय बच्चे ने अपने पिता की कार चलाते हुए मैसूरु-बेंगलुरु हाईवे पर बाइक को टक्कर मार दी थी। हादसे में एक ही परिवार के तीन लोगों की मौत हो गई थी।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सवाल उठाया कि अगर कोई नाबालिग वाहन लेकर सड़क पर निकलता है और उसकी वजह से किसी की जान चली जाती है, तो अभिभावक अपनी जिम्मेदारी से कैसे बच सकते हैं। अदालत ने बच्चों को वाहन उपलब्ध कराने और उन्हें ड्राइविंग की अनुमति देने को लेकर अभिभावकों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए।

तमिलनाडु में सबसे ज्यादा मामले

CAG की रिपोर्ट के मुताबिक नाबालिगों से जुड़े सड़क हादसों में तमिलनाडु में सबसे ज्यादा 2,063 मामले दर्ज हुए। मध्य प्रदेश 1,138 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर रहा।

हाल के दिनों में कई गंभीर घटनाएं भी सामने आई हैं। कर्नाटक के होसकोटे में ट्रक से टकराने के बाद कार में सवार छह किशोरों की मौत हो गई। दिल्ली में नाबालिग चालक द्वारा SUV चलाने के दौरान बाइक सवार युवक की मौत का मामला सामने आया। मुंबई में भी SUV की टक्कर से 15 वर्षीय स्कूटर सवार की जान चली गई।

इन घटनाओं में एक बड़ी समस्या यह सामने आई कि वाहन चलाने वाले नाबालिगों के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था।

सिर्फ वाहन चलाना आना काफी नहीं

विशेषज्ञों का कहना है कि सुरक्षित ड्राइविंग के लिए केवल वाहन चलाना आना पर्याप्त नहीं है। सड़क पर अचानक सामने आने वाले खतरे को पहचानना, सही समय पर फैसला लेना और दबाव की स्थिति में नियंत्रण बनाए रखना भी जरूरी है।

CAG की रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से बताया गया है कि 18 वर्ष से कम उम्र में बच्चों के दिमाग का विकास अभी जारी रहता है। जोखिम को समझने, आत्मनियंत्रण रखने और सही निर्णय लेने की क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होती। इसी वजह से किशोरों में आवेग में फैसला लेने, जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास और दोस्तों के दबाव में वाहन चलाने का जोखिम अधिक हो सकता है।

कानून के बावजूद नाबालिग कैसे चला रहे वाहन?

नाबालिगों के वाहन चलाने के पीछे केवल नियमों की कमी जिम्मेदार नहीं है। कई मामलों में अभिभावक खुद बच्चों को वाहन चलाने की अनुमति दे देते हैं। कुछ लोग यह सोचते हैं कि बच्चा कई बार बाइक या कार चला चुका है और अब तक कोई हादसा नहीं हुआ, इसलिए आगे भी खतरा नहीं होगा।

विशेषज्ञ इसे ‘ऑप्टिमिज्म बायस’ से जोड़ते हैं, यानी व्यक्ति का यह मानना कि दुर्घटना या नुकसान उसके साथ नहीं होगा।

कम स्पीड वाले वाहनों को लेकर भी सवाल

नाबालिगों की राइडिंग में कम गति वाले इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ श्रेणी के वाहनों को लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन से छूट मिलती है। इसी तरह कम इंजन क्षमता वाले कुछ दोपहिया वाहनों के लिए भी अलग नियम हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक समस्या यह है कि एक तरफ किशोरों में सुरक्षित ड्राइविंग के लिए जरूरी अनुभव और परिपक्वता पूरी तरह विकसित नहीं होती, वहीं दूसरी तरफ कुछ मोटराइज्ड वाहनों को चलाने में अपेक्षाकृत आसान नियम मौजूद हैं।

परिवहन विशेषज्ञों का कहना है कि कम रफ्तार पर भी अचानक ब्रेक लगाने, सड़क खराब होने या प्रतिक्रिया में देरी होने से गंभीर दुर्घटना हो सकती है।

सड़क हादसों में दोपहिया वाहनों की बड़ी हिस्सेदारी

MoRTH के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली कुल मौतों में दोपहिया वाहन सवारों की हिस्सेदारी करीब 45 फीसदी थी। दोपहिया वाहनों से जुड़े हादसों में 48,818 लोगों की मौत हुई थी।

हालांकि सरकारी आंकड़ों में यह स्पष्ट नहीं है कि इनमें से कितने हादसे नाबालिग चालकों या बिना लाइसेंस वाले वाहनों से जुड़े थे। इसी वजह से अंडरएज ड्राइविंग का कुल सड़क हादसों में वास्तविक योगदान तय करना मुश्किल है।

नाबालिग की गलती पर अभिभावक भी जिम्मेदार

मोटर व्हीकल्स एक्ट के तहत नाबालिग द्वारा वाहन चलाने के मामले में केवल बच्चे ही नहीं, बल्कि अभिभावक या वाहन मालिक भी कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं।

अगर नाबालिग वाहन चलाते हुए गंभीर हादसे में शामिल होता है, तो अभिभावक को तीन साल तक की जेल और 25 हजार रुपये तक के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है।

यानी नाबालिग को वाहन की चाबी देना सिर्फ एक छोटी लापरवाही नहीं है। यह बच्चे की जान के साथ-साथ सड़क पर मौजूद दूसरे लोगों की सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बन सकता है।

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