सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अपराध के समय नाबालिग रहे आरोपी का अगर नियमित आपराधिक अदालत में बालिग की तरह ट्रायल हो जाए, तो केवल इसी आधार पर उसकी दोषसिद्धि रद्द नहीं होगी। हालांकि, उसे बालिग अपराधी के तौर पर दी गई सजा लागू नहीं की जा सकती।
Knews Desk- सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग आरोपियों के मुकदमों से जुड़े एक अहम मामले में कन्विक्शन और सजा के बीच अंतर स्पष्ट किया है। अदालत ने कहा कि यदि अपराध के समय आरोपी 18 साल से कम उम्र का था, लेकिन उसका मुकदमा सामान्य आपराधिक अदालत में बालिग की तरह चला और उसे दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा दे दी गई, तो बाद में नाबालिग साबित होने पर दोषसिद्धि अपने आप खत्म नहीं होगी। हालांकि, बालिग के लिए निर्धारित सजा उस पर लागू नहीं की जा सकती।
यह फैसला दिनेश कुमार बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा मामले में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम। पंचोली की पीठ ने सुनाया। आरोपी पर हत्या का मामला था और नियमित आपराधिक अदालत ने उसे दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी ने दावा किया कि अपराध के समय उसकी उम्र 18 साल से कम थी। ऐसे में उसका ट्रायल सामान्य क्रिमिनल कोर्ट में बालिग आरोपी के रूप में नहीं चलना चाहिए था। आरोपी ने इसी आधार पर अपनी पूरी दोषसिद्धि रद्द करने की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि कन्विक्शन और सजा दो अलग-अलग चीजें हैं। किसी आरोपी को उपलब्ध सबूतों और मामले की मेरिट के आधार पर दोषी ठहराया जाना कन्विक्शन है, जबकि दोषी पाए जाने के बाद दिया गया दंड सजा कहलाता है।
कोर्ट ने माना कि गलत अदालत में ट्रायल होने के कारण बालिग के तौर पर दी गई सजा टिक नहीं सकती, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि मामले की मेरिट पर दर्ज दोषसिद्धि भी स्वतः समाप्त हो जाएगी।
जुवेनाइल जस्टिस कानून में क्या प्रावधान है?
जुवेनाइल जस्टिस कानून के तहत अपराध के समय 18 साल से कम उम्र का व्यक्ति ‘चाइल्ड इन कॉन्फ्लिक्ट विद लॉ’ माना जाता है। हालांकि, 16 से 18 साल की उम्र के बच्चों पर गंभीर अपराधों के मामलों में कानून ने अलग प्रक्रिया तय की है।
ऐसे मामलों में सबसे पहले जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड यानी JJB को प्रारंभिक मूल्यांकन करना होता है। इसमें बच्चे की मानसिक और शारीरिक क्षमता, कथित अपराध के परिणामों को समझने की क्षमता और अपराध की परिस्थितियों को देखा जाता है।
इसके बाद मामला चिल्ड्रेन कोर्ट के पास जा सकता है। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 19 के तहत चिल्ड्रेन कोर्ट यह तय कर सकती है कि बच्चे का ट्रायल बालिग की तरह किया जाए या नहीं। इसके बावजूद बच्चे के लिए फेयर ट्रायल, चाइल्ड फ्रेंडली माहौल, सुधार और पुनर्वास जैसी बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है।
इस मामले में गलती क्या हुई?
इस केस में आरोपी की उम्र अपराध के समय नाबालिग थी, लेकिन उस समय इस तथ्य के आधार पर उसके खिलाफ जुवेनाइल जस्टिस कानून के तहत प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। उसका मुकदमा सामान्य आपराधिक अदालत में चला और उसे दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी गई।
बाद में जब उसकी नाबालिग होने की बात सामने आई, तो उसने दलील दी कि नियमित अदालत द्वारा की गई पूरी कार्यवाही ही अमान्य मानी जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि दोषसिद्धि को पूरी तरह रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि मामले की मेरिट पर दर्ज कन्विक्शन को केवल इस वजह से खत्म नहीं किया जा सकता कि आरोपी का ट्रायल बालिग की तरह हुआ था। लेकिन नाबालिग होने के कारण उस पर वयस्क अपराधी के लिए निर्धारित सजा लागू नहीं रह सकती।
आरोपी को अब क्या राहत मिली?
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी के नाबालिग होने की दलील को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट की उम्रकैद की सजा को प्रभावहीन कर दिया। इसके साथ ही सात साल की कठोर कारावास, जुर्माने और डिफॉल्ट की शर्तें भी उसके खिलाफ लागू नहीं रहेंगी।
अदालत ने यह भी माना कि आरोपी पहले ही कानून के तहत निर्धारित अधिकतम अवधि से अधिक समय जेल में बिता चुका था। इसलिए उसे रिहा करने का आदेश दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जुवेनाइल जस्टिस कानून का उद्देश्य नाबालिग को वयस्क अपराधी की तरह दंडित करना नहीं, बल्कि उसकी उम्र और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सुधार और पुनर्वास का रास्ता अपनाना है। इस मामले में दोषसिद्धि बरकरार रही, लेकिन बालिग अपराधी के तौर पर सुनाई गई सजा को लागू करने से रोक दिया गया।