KNEWS DESK- भारतीय न्यायपालिका में लंबित मुकदमों का बढ़ता बोझ आम लोगों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में 65 लाख से अधिक मामले लंबित बताए जा रहे हैं। मामलों की लगातार बढ़ती संख्या के चलते कई लोगों को न्याय पाने के लिए वर्षों, बल्कि दशकों तक इंतजार करना पड़ रहा है।
इस स्थिति की गंभीरता राजस्थान के जालोर जिले के एक स्वास्थ्यकर्मी के मामले से समझी जा सकती है। स्वास्थ्यकर्मी को वर्ष 1999 में दैनिक वेतनभोगी के तौर पर काम से हटा दिया गया था। इसके बाद जोधपुर लेबर कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर उन्होंने वर्ष 2004 में राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया। हैरानी की बात यह है कि याचिका दायर किए जाने के 22 साल बाद भी मामले की सुनवाई पूरी नहीं हो सकी।
लंबे इंतजार से परेशान होकर याचिकाकर्ता को जल्द सुनवाई की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए याचिका पर हस्तक्षेप का आधार नहीं पाया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को राजस्थान हाईकोर्ट में जल्द सुनवाई के लिए आवेदन देने की छूट प्रदान की।
देश के प्रमुख उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों का आंकड़ा न्यायिक व्यवस्था पर बढ़ते दबाव को दिखाता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में करीब 12.5 लाख मामले लंबित हैं। यहां प्रत्येक जज या बेंच रोजाना औसतन 150 से 200 मामलों की सुनवाई करती है, लेकिन मामलों की बड़ी संख्या के मुकाबले यह प्रयास भी पर्याप्त साबित नहीं हो रहा है।
लंबित मामलों का यह बोझ न केवल न्याय मिलने में देरी कर रहा है, बल्कि आम नागरिकों के समय, धन और भरोसे पर भी असर डाल रहा है। ऐसे में मुकदमों के जल्द निस्तारण और न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत लगातार बढ़ रही है।