महाराष्ट्र में 64 माओवादी फ्रंटल संगठन सक्रिय, फडणवीस सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में किया दावा

महाराष्ट्र विशेष सार्वजनिक सुरक्षा कानून को लेकर देवेंद्र फडणवीस सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में बड़ा दावा किया है। सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि महाराष्ट्र शहरी माओवादी गतिविधियों का केंद्र बन गया है और राज्य में 64 सक्रिय माओवादी फ्रंटल संगठन मौजूद हैं। सरकार के मुताबिक, यह संख्या देश में सबसे ज्यादा है।

Knews Desk – महाराष्ट्र सरकार ने 6 अक्टूबर को बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में महाराष्ट्र स्पेशल पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट का बचाव किया है। सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि महाराष्ट्र में 64 सक्रिय फ्रंटल संगठन काम कर रहे हैं। सरकार के मुताबिक, शहरी माओवादी नेटवर्क की बढ़ती मौजूदगी को देखते हुए गैरकानूनी और विध्वंसक गतिविधियों से निपटने के लिए विशेष कानूनी ढांचे की जरूरत थी।

सरकार ने कहा कि कानून का उद्देश्य गैरकानूनी, विध्वंसक और चरमपंथी गतिविधियों को रोकना है। साथ ही यह मौलिक अधिकारों, सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय अखंडता की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता है। वहीं कांग्रेस, CPI और अन्य याचिकाकर्ताओं ने कानून की संवैधानिक वैधता को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी है।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि कानून सरकार को संगठनों को गैरकानूनी घोषित करने और उनकी संपत्ति कुर्क करने के लिए व्यापक और मनमाने अधिकार देता है। सरकार ने इन याचिकाओं को खारिज करने की मांग की है। सरकार ने यह भी बताया कि कानून बनने से पहले संयुक्त समिति को सौंपी गई 15,000 से ज्यादा लिखित आपत्तियों पर विचार किया गया था, जिसके बाद कुछ प्रावधानों में बदलाव किए गए।

सरकार ने हाईकोर्ट से याचिकाओं को खारिज करने की मांग करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं ने यह नहीं बताया है कि कानून से उन्हें कोई प्रत्यक्ष कानूनी नुकसान कैसे हुआ है। सरकार ने कानून की जरूरत बताते हुए कहा कि महाराष्ट्र में शहरी माओवादी नेटवर्क की मौजूदगी के चलते ऐसे कानूनी ढांचे की आवश्यकता थी।

यह कानून महाराष्ट्र विधानसभा से पारित होने के बाद दिसंबर 2025 में राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर अधिनियम बना था। कानून का उद्देश्य लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिस्ट संगठनों या उनसे जुड़े समान संगठनों की कुछ गैरकानूनी गतिविधियों की प्रभावी रोकथाम करना है।

हालांकि, हाईकोर्ट में इस कानून की संवैधानिक चुनौती पर अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। मामले में आगे की सुनवाई होनी है।

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