Knews Desk- रूस आर्कटिक क्षेत्र में स्थित नॉर्दर्न सी रूट (NSR) को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एक अहम समुद्री कॉरिडोर के रूप में विकसित करने पर जोर दे रहा है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि भारत और चीन समेत कई देशों की इस रूट में दिलचस्पी बढ़ रही है। रूस का दावा है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत इस रास्ते के इस्तेमाल और विकास में सहयोग की संभावनाएं बढ़ रही हैं।
नॉर्दर्न सी रूट रूस के आर्कटिक तट के साथ बैरेंट्स सागर से बेरिंग स्ट्रेट तक फैला करीब 5,600 किलोमीटर लंबा समुद्री मार्ग है। यह कारा सागर, लाप्टेव सागर, पूर्वी साइबेरियाई सागर और चुकची सागर से होकर गुजरता है।
इस रूट की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम दूरी है। पूर्वी एशिया और उत्तरी यूरोप के बीच यह मार्ग स्वेज नहर वाले रास्ते की तुलना में करीब 30 से 40 फीसदी तक छोटा हो सकता है। इससे समुद्री यात्रा में लगभग 10 से 14 दिन तक की बचत होने की संभावना है।
आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ की स्थिति में बदलाव और कुछ महीनों तक लंबे समय के लिए नौवहन संभव होने के कारण इस मार्ग का रणनीतिक और आर्थिक महत्व बढ़ रहा है।
जहाज कैसे गुजरेंगे?
आर्कटिक में समुद्री बर्फ सबसे बड़ी चुनौती है। यहां सामान्य जहाजों के लिए सफर आसान नहीं है। इसलिए आइस-क्लास जहाजों और आइसब्रेकर की जरूरत पड़ सकती है।
आमतौर पर जुलाई से अक्टूबर के बीच इस रूट पर नौवहन की परिस्थितियां अपेक्षाकृत बेहतर रहती हैं। हालांकि मौसम तेजी से बदल सकता है और बर्फ, धुंध तथा बेहद कम तापमान के कारण यात्रा जोखिमपूर्ण बनी रहती है।
नॉर्दर्न सी रूट को स्वेज नहर का संभावित वैकल्पिक कॉरिडोर माना जा रहा है, लेकिन यह हर तरह के व्यापार के लिए स्वेज या होर्मुज का सीधा विकल्प नहीं बन सकता।
मसलन, खाड़ी देशों से निकलने वाले तेल के लिए होर्मुज की भौगोलिक अहमियत बनी रहेगी। लेकिन चीन-यूरोप, जापान-यूरोप और दक्षिण कोरिया-यूरोप के बीच व्यापार के लिए NSR भविष्य में एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक मार्ग बन सकता है।
लाल सागर और होर्मुज क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी अनिश्चितताओं के बीच एक अतिरिक्त समुद्री कॉरिडोर होने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार को वैकल्पिक रास्ता मिल सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है NSR?
भारत के लिए इस रूट का महत्व खास तौर पर ऊर्जा और कच्चे माल के आयात के लिहाज से है। रूस भारत का एक प्रमुख ऊर्जा साझेदार है और दोनों देशों के बीच तेल, गैस, LNG और अन्य संसाधनों का व्यापार होता है।
अगर आर्कटिक रूट पर पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित हो जाता है और शिपिंग अधिक भरोसेमंद बनती है, तो भारत को रूस से कुछ ऊर्जा और कच्चे माल की सप्लाई में लॉजिस्टिक विकल्प मिल सकते हैं।
कम दूरी और कम ट्रांजिट टाइम से भविष्य में परिवहन और कुछ अन्य लॉजिस्टिक लागतों में कमी की संभावना भी बन सकती है। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे भारत के कुल आयात बिल में कितनी बचत होगी।
अभी NSR पर कितना कारोबार हो रहा है?
NSR पर होने वाला मौजूदा कार्गो ट्रैफिक अभी रूस के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों से काफी कम है। 2025 में इस रूट से करीब 37 मिलियन मीट्रिक टन कार्गो के परिवहन का अनुमान है।
इस कारोबार में रूस के ऊर्जा निर्यात की बड़ी हिस्सेदारी है। LNG, तेल और गैस कंडेनसेट जैसे उत्पाद NSR के कार्गो में प्रमुख स्थान रखते हैं।
रूस लंबे समय से इस मार्ग पर कार्गो ट्रैफिक को बड़े स्तर तक बढ़ाने की योजना बना रहा है। हालांकि मौजूदा आंकड़ों को देखते हुए उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए बड़े निवेश और बेहतर बुनियादी ढांचे की जरूरत होगी।
भारत के सामने क्या चुनौतियां हैं?
भारत के लिए NSR में संभावनाएं जरूर हैं, लेकिन इसके साथ कई बड़ी चुनौतियां भी जुड़ी हैं।
- आर्कटिक में बेहद कम तापमान और समुद्री बर्फ नेविगेशन को कठिन बनाती है।
- आइस-क्लास जहाजों और आइसब्रेकर की जरूरत से लागत बढ़ सकती है।
- पूरे रूट पर पर्याप्त बंदरगाह, ईंधन स्टेशन और लॉजिस्टिक हब मौजूद नहीं हैं।
- सर्च एंड रेस्क्यू और आपातकालीन सुविधाओं को मजबूत करने की जरूरत है।
- खराब मौसम और सीमित संचार नेटवर्क जोखिम बढ़ा सकते हैं।
- रूस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध शिपिंग, बीमा और वित्तीय लेनदेन को प्रभावित कर सकते हैं।
- भारत को अपने बंदरगाहों से आर्कटिक रूट और यूरोपीय बंदरगाहों तक बेहतर कनेक्टिविटी और ट्रांसशिपमेंट व्यवस्था विकसित करनी होगी।
क्या NSR भारत के लिए गेमचेंजर बनेगा?
नॉर्दर्न सी रूट फिलहाल स्वेज नहर का पूरी तरह विकल्प नहीं, बल्कि एक अतिरिक्त और रणनीतिक समुद्री कॉरिडोर के रूप में ज्यादा महत्वपूर्ण है।
भारत के लिए इसकी सबसे बड़ी संभावनाएं रूस के साथ ऊर्जा और कच्चे माल के व्यापार में दिखाई देती हैं। अगर रूस आर्कटिक क्षेत्र में बंदरगाह, आइसब्रेकर, संचार और आपातकालीन सुविधाओं समेत जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में सफल होता है, तो NSR आने वाले वर्षों में एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
यानी बर्फ से घिरा यह समुद्री रास्ता अभी चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन भविष्य में भारत के लिए एक नया रणनीतिक व्यापार मार्ग साबित हो सकता है।