दिल्ली में पुलिस और वकीलों के बीच टकराव का इतिहास पुराना है। शाहदरा थाने में हालिया झड़प और ACP मनस्वी वशिष्ठ के निलंबन ने एक बार फिर इस विवाद को सुर्खियों में ला दिया है। साल 1988 में तीस हजारी कोर्ट में हुए लाठीचार्ज से लेकर 2019 के हिंसक टकराव तक, कई घटनाओं ने दोनों पक्षों के बीच तनाव को उजागर किया है।
Knews Desk – दिल्ली में पुलिस और वकीलों के बीच विवाद एक बार फिर चर्चा में है। ताजा मामला शाहदरा थाने में हुई झड़प से जुड़ा है, जहां मोटरसाइकिल को लेकर शुरू हुआ विवाद पुलिस स्टेशन तक पहुंच गया और देखते ही देखते मारपीट में बदल गया। इस घटना में वकील ललित बंसल के सिर में गंभीर चोट लगने की बात सामने आई। इसके बाद वकीलों ने पुलिस पर कार्रवाई की मांग करते हुए दिल्ली की जिला अदालतों में अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी।
वकीलों ने आरोप लगाया कि उनकी शिकायत पर उचित कार्रवाई नहीं की गई और ACP मनस्वी वशिष्ठ ने उन्हें धमकाने के साथ अपनी रिवॉल्वर भी दिखाई। हालांकि, ACP ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। विवाद बढ़ने के बाद 28 अक्टूबर को ACP मनस्वी वशिष्ठ और शाहदरा थाने के तत्कालीन SHO अरुण कुमार का तबादला कर दिया गया। इसके बाद वकीलों ने अपनी हड़ताल समाप्त कर दी।
दूसरी ओर, दोनों अधिकारियों के तबादले के विरोध में पुलिसकर्मियों के एक वर्ग ने प्रदर्शन शुरू कर दिया। 2 नवंबर को सैकड़ों पुलिसकर्मी पुलिस मुख्यालय के बाहर जुटे और तबादले रद्द करने की मांग की। इस प्रदर्शन में ACP मनस्वी वशिष्ठ भी शामिल हुए। इसके बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया। पुलिसकर्मियों ने वकीलों के खिलाफ कार्रवाई और थानों तथा अदालत परिसरों में पुलिसकर्मियों की सुरक्षा के लिए नियम बनाने की मांग उठाई।
दिल्ली पुलिस और वकीलों के बीच टकराव का इतिहास देखें तो जनवरी 1988 की घटना सबसे चर्चित मामलों में से एक रही है। उस समय दिल्ली पुलिस ने राजेश अग्निहोत्री नाम के एक वकील को गिरफ्तार किया था। सेंट स्टीफंस कॉलेज के छात्रों ने उन्हें महिलाओं के कॉमन रूम से चोरी के आरोप में पकड़ा था। 16 जनवरी को जब उन्हें हथकड़ी लगाकर तीस हजारी कोर्ट में पेश किया गया, तो वकीलों ने इसका विरोध किया।
मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने उसी दिन वकील को बरी कर दिया और पुलिस कमिश्नर को संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया। इसके बाद वकील 18 जनवरी से हड़ताल पर चले गए। 20 जनवरी को तत्कालीन वरिष्ठ IPS अधिकारी किरण बेदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में पुलिस की कार्रवाई का बचाव किया। अगले दिन वकीलों का एक समूह तीस हजारी कोर्ट परिसर में स्थित उनके कार्यालय में अपनी चिंताएं रखने पहुंचा। इस दौरान लाठीचार्ज हुआ, जिसमें 100 से अधिक वकीलों के घायल होने की बात सामने आई। वकीलों ने आरोप लगाया कि उन्हें दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया।
इस घटना के बाद दिल्ली और पड़ोसी राज्यों में करीब दो महीने तक अदालतों का कामकाज प्रभावित रहा। वकीलों ने किरण बेदी के इस्तीफे की मांग की। मामले की जांच के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने तत्कालीन जज डीपी वाधवा की अध्यक्षता में दो जजों की समिति गठित की। समिति ने अपनी रिपोर्ट में हथकड़ी लगाने को गैरकानूनी बताया और किरण बेदी के तबादले की सिफारिश की। इसके बाद हड़ताल समाप्त हुई।
साल 2019 में भी दिल्ली पुलिस और वकीलों के बीच बड़ा टकराव देखने को मिला। 2 नवंबर को तीस हजारी कोर्ट परिसर में पार्किंग को लेकर शुरू हुआ विवाद हिंसक हो गया। इस दौरान गोली चलने, लाठीचार्ज और वाहनों में आगजनी की घटनाएं सामने आईं। हिंसा में पुलिसकर्मियों और वकीलों समेत कई लोग घायल हुए। दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले का संज्ञान लेते हुए दो पुलिसकर्मियों को निलंबित किया और न्यायिक जांच के आदेश दिए।
इसके बाद साकेत और कड़कड़डूमा अदालत परिसरों में भी पुलिसकर्मियों और वकीलों के बीच टकराव हुआ। 5 नवंबर 2019 को दिल्ली पुलिस के हजारों जवान अपने मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन करने पहुंचे। उन्होंने वकीलों के हमलों और पुलिसकर्मियों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया।
शाहदरा थाने का ताजा विवाद एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि पुलिस और वकीलों के बीच टकराव रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था कैसे बनाई जाए। दोनों पक्षों के बीच विवाद का असर न केवल कानून-व्यवस्था पर पड़ता है, बल्कि अदालतों के कामकाज और आम लोगों को मिलने वाले न्याय पर भी पड़ सकता है।