टीपू सुल्तान के शासन और धार्मिक नीतियों को लेकर इतिहास में लंबे समय से बहस होती रही है. उनकी चिट्ठियों और इतिहासकारों के हवाले से उनके शासनकाल के अलग-अलग पहलुओं का जिक्र मिलता है.
Knews Desk- टीपू सुल्तान का नाम भारतीय इतिहास के उन शासकों में शामिल है, जिनको लेकर आज भी अलग-अलग मत देखने को मिलते हैं. एक ओर उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ मजबूती से लड़ने वाले शासक के तौर पर याद किया जाता है, वहीं दूसरी ओर उनके शासनकाल में धर्मांतरण, मंदिरों पर कार्रवाई और धार्मिक नीतियों को लेकर गंभीर आरोप लगाए जाते हैं.
इतिहासकारों और उपलब्ध पत्रों के हवाले से सामने आने वाले प्रसंगों में एक विरोधाभास भी दिखाई देता है. युद्ध और सत्ता के मजबूत दौर में टीपू पर जबरन धर्मांतरण और धार्मिक दबाव के आरोप लगे, जबकि अंग्रेजों के साथ संघर्ष के अंतिम वर्षों में उन्होंने हिंदू धार्मिक संस्थानों और ब्राह्मणों से मदद भी मांगी.
इतिहासकार ब्लिंक्स के अनुसार, टीपू के स्वभाव और व्यवहार को लेकर उनके पिता हैदर अली भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे. टीपू का गुस्सैल और जिद्दी स्वभाव उन्हें पसंद नहीं था.
टीपू की कुछ गतिविधियों ने हैदर अली को खास तौर पर नाराज किया. बताया जाता है कि शिकार के दौरान टीपू हिंदू मंदिरों में पाले जाने वाले सांडों को भाले से घायल कर देते थे और कई बार उन्हें मार भी देते थे.
एक अन्य घटना में युद्ध के दौरान पकड़े गए एक अंग्रेज सैनिक का जबरन खतना कराने का आरोप टीपू पर लगा. उस समय हैदर अली अंग्रेजों के साथ समझौते की कोशिश कर रहे थे. ऐसे में टीपू की इस कार्रवाई से उन्हें आशंका हुई कि अंग्रेजों के साथ संबंध और बिगड़ सकते हैं.
सत्ता मिलने के बाद बढ़ी सख्ती
हैदर अली की मृत्यु के बाद जब टीपू सुल्तान मैसूर की गद्दी पर बैठे, तो शुरुआती सैन्य सफलताओं के साथ उनका प्रभाव और कठोर शासन भी बढ़ता गया.
कूर्ग में विद्रोह की स्थिति के दौरान 17 सितंबर 1785 को टीपू ने अपने कमांडर जैन उल आबिदीन शूस्तरी को कथित तौर पर आदेश भेजा कि विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई के दौरान पकड़े जाने वाले लोगों को इस्लाम में शामिल किया जाए.
इसके बाद कूर्ग में बड़े पैमाने पर लोगों के धर्मांतरण का दावा सामने आया. 5 जनवरी 1786 को करनूल के नवाब को लिखे पत्र में टीपू ने करीब 40 हजार विद्रोहियों को पकड़कर उन्हें इस्लाम में शामिल करने और अहमदी सेना में भर्ती करने का उल्लेख किया.
धर्मांतरण की संख्या पर इतिहासकारों में मतभेद
कूर्ग में धर्मांतरित किए गए लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग इतिहासकारों ने अलग आंकड़े दिए हैं. टीपू ने अपने एक पत्र में यह संख्या 50 हजार बताई, जबकि इतिहासकार किरमानी ने करीब 80 हजार और जर्मन मिशनरी जॉर्ज रिखटर ने 85 हजार तक का आंकड़ा बताया.
आंकड़ों में अंतर जरूर है, लेकिन इन विवरणों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का उल्लेख मिलता है.
13 जनवरी 1786 को मीर मुईनुद्दीन को लिखे पत्र में टीपू ने कूर्ग के करीब 50 हजार पुरुषों और महिलाओं को बंदी बनाकर अहमदी वर्ग में शामिल किए जाने का जिक्र किया. इस घटना को उन्होंने इस्लाम की ताकत बढ़ाने वाली घटना के रूप में बताया.
नायर कैदियों को लेकर भी दिया था आदेश
धर्मांतरण को लेकर टीपू की नीतियों के कई अन्य उदाहरण भी मिलते हैं. 28 फरवरी 1789 को कालीकट के दीवान को लिखे पत्र में 242 नायर कैदियों का जिक्र करते हुए उन्हें खतना कराकर मुसलमान बनाने का निर्देश देने की बात सामने आती है.
इसके कुछ दिन बाद एक अन्य पत्र में टीपू ने जिहाद और इस्लाम के विस्तार को लेकर अपने विचार व्यक्त किए. विक्रम संपत के अनुसार, मार्च 1789 में कुट्टीपुरम के आसपास दो हजार नायर परिवारों के सामने इस्लाम स्वीकार करने या क्षेत्र छोड़ने की शर्त रखी गई थी.
मंदिरों पर कार्रवाई को लेकर भी विवाद
टीपू के शासनकाल में मंदिरों को नुकसान पहुंचाने के आरोप भी इतिहास का विवादित हिस्सा रहे हैं. चिरक्कल के राजा के पारिवारिक मंदिर को बचाने के लिए बड़ी रकम और मंदिर की सोने की प्लेटें देने की पेशकश का भी उल्लेख मिलता है.
कुछ विवरणों में टीपू के शासनकाल में हजारों मंदिरों को नष्ट किए जाने का दावा किया गया है. हालांकि इतिहासकार ब्लिंक्स ने आठ हजार मंदिरों के नष्ट होने के दावे को लेकर संदेह जताया और इसे संभवतः अतिशयोक्तिपूर्ण बताया. उनके अनुसार, मलबार में बड़ी संख्या में मंदिरों को नुकसान पहुंचाए जाने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन सटीक संख्या विवादित है.
श्रृंगेरी मठ के लिए बदल गया रवैया
टीपू सुल्तान की धार्मिक नीति का दूसरा पहलू 1791 में सामने आता है, जब मराठा सैनिकों द्वारा श्रृंगेरी मठ पर हमला किए जाने की खबर मिली.
इस हमले में मठ को नुकसान पहुंचाने और देवी शारदा की मूर्ति को क्षतिग्रस्त किए जाने का उल्लेख मिलता है. इसके बाद टीपू ने शंकराचार्य को पत्र लिखकर घटना पर दुख जताया और मूर्ति को दोबारा स्थापित कराने की बात कही.
टीपू ने मठ की मरम्मत और पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक मदद भी भेजी. इसके अलावा उन्होंने शंकराचार्य को पालकी और अन्य उपहार दिए तथा मैसूर की प्रजा के कल्याण के लिए पूजा और तप करने का आग्रह किया.
आखिरी दौर में ज्योतिष और मंत्रों पर भरोसा
अंग्रेजों के बढ़ते दबाव के बीच टीपू का धार्मिक संस्थानों से संपर्क और बढ़ा. 26 मई 1791 को कूर्ग के लोगों को लिखे पत्र में उन्होंने उन्हें पहले की तरह अपने धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने की अनुमति देने की बात कही.
14 सितंबर 1791 के एक पत्र में टीपू ने शंकराचार्य द्वारा उनकी जीत के लिए किए गए शत चंडी जाप के प्रति आभार जताया.
उनके जीवन के अंतिम दिन यानी 4 मई 1799 को भी धार्मिक अनुष्ठानों का उल्लेख मिलता है. अंग्रेजों के साथ निर्णायक युद्ध से पहले चन्नपट्टना से बड़ी संख्या में ब्राह्मण पुजारियों को बुलाया गया. टीपू की जिंदगी की रक्षा और जीत के लिए उनसे लगातार मंत्र-जाप कराया गया.
इस दौरान टीपू ने पुजारियों को दक्षिणा और अलग-अलग वस्तुएं भी दान कीं. बताया जाता है कि एक अनुष्ठान में उन्हें तेल से भरे पात्र में अपनी परछाईं देखने की प्रक्रिया में भी शामिल होना था.
लेकिन इन धार्मिक अनुष्ठानों के बीच युद्ध की स्थिति टीपू के खिलाफ जा चुकी थी. अंग्रेज किले की दीवारों को तोड़ चुके थे, उनकी सेना कमजोर पड़ रही थी और इसी संघर्ष में 4 मई 1799 को टीपू सुल्तान की मौत हो गई.