KNEWS DESK- नेपाल में आई प्रलयंकारी बाढ़ ने देश के जलविद्युत क्षेत्र को बड़ा झटका दिया है। भोटेकोशी और त्रिशूली घाटियों में ग्लेशियर हने के बाद अचानक आई बाढ़ और मलबे ने 14 हाइड्रोपावर परियोजनाओं को नुकसान पहुंचाया है। इनमें छह निर्माणाधीन परियोजनाएं भी शामिल हैं। कई परियोजनाओं को भारी नुकसान हुआ है, जबकि कुछ पूरी तरह तबाह हो गई हैं।
नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के मुताबिक, बाढ़ से प्रभावित परियोजनाओं के कारण करीब 431 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता पर असर पड़ा है। यह नेपाल की कुल बिजली उत्पादन क्षमता के 12 प्रतिशत से अधिक के बराबर है। इस घटना ने देश की उस आर्थिक रणनीति पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें हिमालयी नदियों से मिलने वाली जलविद्युत क्षमता को आर्थिक विकास का प्रमुख आधार माना जाता है।
नेपाल लंबे समय से खुद को नवीकरणीय ऊर्जा के बड़े उत्पादक और बिजली निर्यातक देश के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। इसी रणनीति के तहत भारत, चीन और अन्य देशों की कंपनियों ने नेपाल के जलविद्युत क्षेत्र में निवेश बढ़ाया है। लेकिन हालिया प्राकृतिक आपदा ने इस क्षेत्र से जुड़े जोखिमों को भी सामने ला दिया है।
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशियन स्टडीज के रिसर्च फेलो पुष्प शर्मा के अनुसार, नेपाल के सामने एक साथ दो बड़ी चुनौतियां हैं। पहली चुनौती जलवायु परिवर्तन की वजह से हिमालयी क्षेत्र में बढ़ता प्राकृतिक आपदाओं का खतरा है। ग्लेशियरों के पिघलने, अचानक बाढ़, भूस्खलन और अत्यधिक बारिश जैसी घटनाओं से बिजली परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने का जोखिम लगातार बढ़ रहा है।
दूसरी बड़ी चुनौती बिजली उत्पादन और उसके निर्यात को लेकर भारत पर नेपाल की निर्भरता है। नेपाल में पैदा होने वाली अतिरिक्त बिजली के लिए भारत फिलहाल सबसे बड़ा और व्यावहारिक बाजार है। दूसरे देशों तक बिजली पहुंचाने के लिए भी भारत के पावर ग्रिड की अहम भूमिका है।
ऐसे में नेपाल में बड़े पैमाने पर जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण सिर्फ बिजली उत्पादन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह निवेश, बुनियादी ढांचे, सीमा-पार बिजली कारोबार और क्षेत्रीय राजनीति से भी जुड़ा हुआ है। भारत और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का असर नेपाल के ऊर्जा क्षेत्र पर भी दिखाई देता है।
नेपाल में करीब 83 गीगावाट की सैद्धांतिक जलविद्युत क्षमता मौजूद मानी जाती है। इसमें लगभग 43 गीगावाट क्षमता ऐसी है, जिसे आर्थिक और तकनीकी रूप से विकसित किया जा सकता है। हालांकि, अभी इस विशाल क्षमता का एक छोटा हिस्सा ही इस्तेमाल हो पाया है।
जलविद्युत क्षमता का पूरा इस्तेमाल करने के लिए नेपाल को बांधों, बिजलीघरों, ट्रांसमिशन लाइनों और अन्य बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा। पहाड़ी भूगोल, कठिन निर्माण परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे के बीच यह चुनौती और बड़ी हो जाती है।
नेपाल की स्थापित जलविद्युत क्षमता भी तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2024 में यह करीब 3,000 मेगावाट थी, जो अब बढ़कर 4,000 मेगावाट से अधिक हो चुकी है। ऐसे में हालिया बाढ़ ने नेपाल के सामने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि भविष्य में जलविद्युत परियोजनाओं के विस्तार के साथ प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा और मजबूत बुनियादी ढांचे को कितनी प्राथमिकता दी जाएगी।