डिजिटल डेस्क- उच्चतम न्यायालय ने 2020 के दिल्ली दंगों और शाहीन बाग विरोध प्रदर्शनों के दौरान दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों के मामले में भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा को बड़ी राहत प्रदान की है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 29 अप्रैल 2026 को अपना निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया कि दोनों नेताओं द्वारा दिए गए भाषणों से कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है। इस फैसले के साथ ही सीपीआई(एम) नेताओं बृंदा करात और के.एम. तिवारी द्वारा एफआईआर दर्ज कराने के लिए की गई लंबी कानूनी जद्दोजहद का अंत हो गया है, क्योंकि अदालत ने उनकी याचिकाओं को आधारहीन पाते हुए खारिज कर दिया है।
वीडियो फुटेज और प्रस्तुत सामग्रियों की हुई गहन पड़ताल
अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि प्रस्तुत की गई सामग्रियों और वीडियो फुटेज की गहन पड़ताल के बाद यह पाया गया कि इन भाषणों में किसी विशेष समुदाय के विरुद्ध हिंसा फैलाने या सार्वजनिक शांति भंग करने का कोई स्पष्ट तत्व मौजूद नहीं था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के 2022 के फैसले के निष्कर्ष को तो बरकरार रखा, लेकिन उसकी कानूनी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण सुधार किया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि एफआईआर दर्ज करने के लिए सरकार की पूर्व अनुमति (सैंक्शन) की आवश्यकता नहीं होती है; ऐसी अनुमति केवल उस समय अनिवार्य है जब कोई निचली अदालत मामले का संज्ञान लेती है।
फैसले को भाजपा ने सत्य की जीत करार दिया
फैसले के दौरान पीठ ने हेट स्पीच पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए इसे संविधान की ‘भाईचारे’ वाली भावना के खिलाफ बताया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि नफरती भाषण समाज के नैतिक ढांचे को कमजोर करते हैं, लेकिन साथ ही यह भी माना कि मौजूदा भारतीय कानून इस समस्या से निपटने के लिए पूर्णतः सक्षम हैं और किसी नए कानून की आवश्यकता नहीं है। इस फैसले के बाद भाजपा ने इसे ‘सत्य की जीत’ करार दिया है, जबकि याचिकाकर्ता पक्ष ने इसे कानूनी रूप से निराशाजनक बताया है। वर्तमान में इस निर्णय से दोनों नेताओं पर मंडरा रहे कानूनी संकट के बादल पूरी तरह छंट गए हैं।