KNEWS DESK- देश में एनर्जी ड्रिंक इंडस्ट्री इन दिनों बड़े संकट का सामना कर रही है। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) के एक निर्देश ने लगभग ₹13,000 करोड़ के इस बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है। रेगुलेटर ने कंपनियों को अपने उत्पादों की पैकेजिंग से “Energy Drink” शब्द हटाने के लिए 90 दिनों की समयसीमा दी है। इस फैसले के बाद देशभर के डिस्ट्रीब्यूटर्स में घबराहट का माहौल है और कई ने कंपनियों से मौजूदा स्टॉक लेने से इनकार कर दिया है।
इसका असर बाजार में भी दिखाई देने लगा है। कई शहरों की रिटेल दुकानों पर रेड बुल, पेप्सिको की स्टिंग, मॉन्स्टर, हेल एनर्जी, कैम्पा एनर्जी और कोका-कोला की थम्स अप चार्ज्ड जैसे लोकप्रिय ब्रांड्स की उपलब्धता प्रभावित हुई है। डिस्ट्रीब्यूटर्स का कहना है कि यदि भविष्य में इन उत्पादों की बिक्री या लेबलिंग को लेकर कोई कार्रवाई होती है तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। यही वजह है कि वे नए स्टॉक की सप्लाई लेने से बच रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह विवाद FSSAI और एनर्जी ड्रिंक कंपनियों के बीच लेबलिंग नियमों को लेकर गहरा गया है। रेगुलेटर का कहना है कि भारत में “Energy Drink” नाम की कोई मान्यता प्राप्त खाद्य श्रेणी नहीं है। ऐसे में कंपनियां इस शब्द का उपयोग कर उपभोक्ताओं को भ्रमित नहीं कर सकतीं। इसके अलावा, पैकेजिंग पर “एनर्जी बढ़ाने” या “शरीर और दिमाग को नई ऊर्जा देने” जैसे दावों पर भी FSSAI ने आपत्ति जताई है।
उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इस फैसले से बड़ी मात्रा में मौजूदा स्टॉक फंस गया है। भारत में बिकने वाले कई एनर्जी ड्रिंक पश्चिम एशिया समेत अन्य देशों से आयात किए जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज स्ट्रेट के आसपास हजारों कैन अभी भी शिपमेंट में हैं, जिन पर “Energy Drink” लिखा हुआ है। यदि नियमों के मुताबिक इन उत्पादों की बिक्री नहीं हो पाती तो कंपनियों और आयातकों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।
कंपनियों ने FSSAI से 90 दिनों की समयसीमा बढ़ाने की मांग की थी ताकि वे पुराने स्टॉक को बाजार से निकाल सकें और नई पैकेजिंग तैयार कर सकें। हालांकि, रेगुलेटर ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। 2 जुलाई को जारी निर्देश के अनुसार, निर्धारित अवधि के भीतर सभी कंपनियों को नई लेबलिंग व्यवस्था अपनानी होगी।
भारत का एनर्जी ड्रिंक बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है। उद्योग के अनुमान के अनुसार, इसकी सालाना बिक्री करीब ₹13,000 करोड़ है और हर वर्ष इसमें 20 से 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की जा रही है। खासतौर पर युवाओं के बीच इन उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता ने इस बाजार को तेजी से बढ़ाया है। ऐसे में नियामकीय बदलाव का असर पूरे उद्योग पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि कुछ राज्यों के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) अधिकारियों ने डिस्ट्रीब्यूटर्स के गोदामों में रखे ऐसे उत्पादों की जांच शुरू कर दी है और कुछ स्थानों पर स्टॉक जब्त किए जाने की भी जानकारी सामने आई है। हालांकि, इस संबंध में प्रमुख कंपनियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।
इस बीच इंडियन बेवरेज एसोसिएशन (IBA) ने भी FSSAI से फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है। IBA की सेक्रेटरी जनरल गुनवीना चड्ढा ने FSSAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि नए निर्देश को लागू करने से पहले उद्योग जगत के साथ विस्तृत चर्चा की जाए। उन्होंने कहा कि मौजूदा मानक कई वर्षों की विशेषज्ञ सलाह, जोखिम मूल्यांकन और विभिन्न हितधारकों से विचार-विमर्श के बाद तैयार किए गए थे। एसोसिएशन का मानना है कि उद्योग को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए ताकि किसी भी निर्णय का असर कारोबार और उपभोक्ताओं पर न्यूनतम हो।