KNEWS DESK- देश में नई शिक्षा नीति (NEP) और शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून के तहत हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने का लक्ष्य तय किया गया है। लेकिन सरकारी आंकड़े इस लक्ष्य और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर दिखाते हैं। शिक्षा मंत्रालय ने संसद में जानकारी दी है कि देश में 2025-26 के दौरान 1,00,843 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां पूरे स्कूल की जिम्मेदारी सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे है। यानी इन स्कूलों में अलग-अलग कक्षाओं के छात्रों को पढ़ाने से लेकर प्रशासनिक कार्य तक एक ही शिक्षक को संभालना पड़ रहा है।
राज्यसभा में सांसद रणदीप सुरजेवाला के सवाल के जवाब में शिक्षा मंत्रालय ने यह जानकारी दी। आंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक सिंगल-टीचर स्कूल आंध्र प्रदेश में हैं। इसके बाद झारखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश का स्थान है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे स्कूलों में छात्रों की पढ़ाई और सीखने की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ता है, क्योंकि एक शिक्षक के लिए सभी कक्षाओं और विषयों को प्रभावी ढंग से संभालना बेहद कठिन होता है।
सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर एक और चिंताजनक तथ्य सामने आया है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में देशभर में करीब 94 हजार सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। इसके चलते सरकारी स्कूलों में छात्रों के नामांकन में लगभग 2.26 करोड़ की कमी दर्ज की गई है। रिपोर्ट बताती है कि सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख रह गई है, जबकि इसी अवधि में निजी स्कूलों की संख्या में वृद्धि हुई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी स्कूलों के बंद होने, शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण बड़ी संख्या में अभिभावक निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं। इसका असर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर सबसे अधिक पड़ रहा है, क्योंकि उनके लिए निजी शिक्षा का खर्च उठाना आसान नहीं है।
हालांकि केंद्र और राज्य सरकारें समय-समय पर शिक्षक भर्ती, स्कूलों के एकीकरण, डिजिटल शिक्षा और आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही हैं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में सिंगल-टीचर स्कूलों का मौजूद होना शिक्षा व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती बना हुआ है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गुणवत्तापूर्ण और समान शिक्षा का लक्ष्य हासिल करना है, तो शिक्षकों की पर्याप्त नियुक्ति, बंद हो चुके स्कूलों की समीक्षा और सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना बेहद जरूरी होगा। तभी नई शिक्षा नीति और शिक्षा के अधिकार कानून के उद्देश्यों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकेगा।