किशोरियों में मोटापा और PCOS जैसी स्वास्थ्य समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। AIIMS नई दिल्ली की एक स्टडी में स्कूल जाने वाली लड़कियों में बढ़ते मोटापे, अनियमित पीरियड्स और जीवनशैली से जुड़ी परेशानियों को लेकर चिंता जताई गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, स्क्रीन टाइम में बढ़ोतरी, शारीरिक गतिविधियों में कमी और पोषण से जुड़ी समस्याएं इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
Knews Desk– AIIMS नई दिल्ली के पीडियाट्रिक एंडोक्रिनोलॉजी विभाग की प्रोफेसर रजनी शर्मा ने बताया कि संस्थान NGO ‘सोसाइटी ऑफ एंडोक्राइन हेल्थ इन एल्डरली, एडोलसेंट, एंड चिल्ड्रन’ के साथ मिलकर अलग-अलग स्कूलों में बच्चों और किशोरियों की स्क्रीनिंग कर रहा है। इस दौरान मेटाबोलिक समस्याओं, पोषण संबंधी स्वास्थ्य और PCOS जैसी समस्याओं की जांच की जा रही है। जिन छात्राओं में किसी तरह की परेशानी सामने आती है, उन्हें आगे की जांच के लिए AIIMS बुलाया जाता है।
प्रोफेसर रजनी शर्मा के मुताबिक, यह स्टडी पिछले तीन साल से जारी है और अब इसे फॉलो-अप स्टडी के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि स्कूलों में किशोरियों के बीच मोटापे और अधिक वजन की समस्या बड़े स्तर पर सामने आ रही है। प्राइवेट स्कूलों में करीब 40 से 45 प्रतिशत तक लड़कियां अधिक वजन या मोटापे की समस्या से जूझ रही हैं। वहीं, सरकारी स्कूलों में भी करीब 15 प्रतिशत बच्चों में अधिक वजन या मोटापे की समस्या देखी जा रही है।
स्टडी के दौरान किशोरियों में अनियमित मासिक धर्म के कई मामले भी सामने आए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पीरियड्स शुरू होने के कुछ समय बाद ही कई लड़कियों में अनियमित मासिक धर्म की समस्या देखने को मिल रही है। 11 से 19 वर्ष की उम्र की लड़कियों में भी PCOS के मामले सामने आ रहे हैं। प्रोफेसर रजनी शर्मा ने कहा कि जांच के दौरान किशोरियों में PCOS की समस्या बड़े पैमाने पर पाई गई है।
AIIMS नई दिल्ली के साइकियाट्री विभाग की चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट रेनू शर्मा ने बच्चों और किशोरों पर बढ़ते स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया के इस्तेमाल के प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बच्चे सोशल मीडिया, WhatsApp, चैटिंग और गेमिंग में काफी समय बिता रहे हैं। खासकर किशोर उम्र के बच्चे मोबाइल फोन और गेमिंग में लंबे समय तक व्यस्त रहते हैं।
रेनू शर्मा के अनुसार, लंबे समय तक स्क्रीन देखने का असर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। इससे किशोरों में मोटापा, तनाव और व्यवहार संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं, जो PCOS के जोखिम से भी जुड़ी हुई हैं। उन्होंने बच्चों और किशोरों के स्क्रीन टाइम की सीमा तय करने की जरूरत पर जोर दिया। साथ ही, माता-पिता को बच्चों के डिजिटल इस्तेमाल पर ध्यान देने और डिजिटल वेल-बीइंग को प्राथमिकता देने की सलाह दी।