Knews Desk- उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से निकलकर भारतीय जेवलिन थ्रो में अपनी पहचान बनाने वाले रोहित यादव ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में एक बार फिर लोगों का ध्यान खींचा। 25 वर्षीय रोहित भले ही जेवलिन थ्रो के फाइनल में मेडल हासिल नहीं कर सके, लेकिन 81.56 मीटर के अपने सर्वश्रेष्ठ थ्रो के साथ उन्होंने शानदार चुनौती पेश की। उनका यहां तक पहुंचने का सफर भी बेहद संघर्षपूर्ण रहा है। एक समय ऐसा था जब परिवार के पास प्रोफेशनल भाला खरीदने तक के पैसे नहीं थे और रोहित बांस के डंडों से अभ्यास किया करते थे।
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के पुरुष जेवलिन थ्रो फाइनल में भारतीय खिलाड़ियों ने दमदार प्रदर्शन किया। नीरज चोपड़ा ने 85.83 मीटर के थ्रो के साथ सिल्वर मेडल अपने नाम किया, जबकि यशवीर सिंह ने 85.41 मीटर का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए ब्रॉन्ज मेडल जीता।
भारत के तीसरे फाइनलिस्ट रोहित यादव का सर्वश्रेष्ठ प्रयास 81.56 मीटर रहा। यह दूरी उन्हें पदक तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त नहीं रही और उन्होंने सातवें स्थान पर प्रतियोगिता समाप्त की।
श्रीलंका के रुमेश पथिरागे ने 89.75 मीटर के थ्रो के साथ गोल्ड मेडल जीता। वहीं पाकिस्तान के अरशद नदीम का सर्वश्रेष्ठ थ्रो 77.41 मीटर रहा। इस लिहाज से रोहित यादव का प्रदर्शन अरशद नदीम से बेहतर रहा।
उतार-चढ़ाव से भरा रहा रोहित का फाइनल
रोहित यादव ने अपने पहले प्रयास में 77.50 मीटर का थ्रो किया। दूसरे प्रयास में उन्होंने प्रदर्शन में बड़ा सुधार करते हुए भाला 81.56 मीटर दूर फेंका और पदक की दौड़ में अपनी दावेदारी मजबूत की।
हालांकि इसके बाद उनके लिए मुकाबला आसान नहीं रहा। तीसरा प्रयास फाउल रहा, जबकि चौथे प्रयास में वह 73.70 मीटर तक ही पहुंच सके। पांचवां प्रयास भी फाउल हुआ। आखिरी प्रयास में रोहित ने 79.55 मीटर का थ्रो किया, लेकिन वह अपने 81.56 मीटर के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को पीछे नहीं छोड़ पाए।
जौनपुर के छोटे से गांव से निकला खिलाड़ी
रोहित यादव का जन्म 6 जून 2001 को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के डभिया गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। उनके पिता सभाजीत यादव किसान होने के साथ पूर्व डेकाथलॉन एथलीट भी रहे हैं। खेल से जुड़े होने के कारण वह अपने बेटे की प्रतिभा को शुरुआती दौर में ही पहचान गए थे।
सभाजीत यादव चाहते थे कि रोहित जेवलिन थ्रो में आगे बढ़ें। आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होने के कारण परिवार के लिए महंगा प्रोफेशनल जैवलिन खरीदना आसान नहीं था। ऐसे में संसाधनों की कमी रोहित के सपनों के रास्ते में बाधा जरूर बनी, लेकिन उन्हें रोक नहीं सकी।
बांस के डंडों को बनाया भाला
रोहित के शुरुआती कोच उनके पिता ही थे। ट्रेनिंग के लिए प्रोफेशनल उपकरण उपलब्ध नहीं होने पर उन्होंने स्थानीय इलाकों से मिलने वाले बांस के डंडों को भाले की तरह इस्तेमाल करना शुरू किया। इन्हीं साधारण संसाधनों के सहारे उन्होंने जेवलिन थ्रो की बारीकियां सीखीं और लगातार अपनी क्षमता को निखारा।
समय के साथ उनकी मेहनत रंग लाई। रोहित ने अंडर-18 स्तर पर 81.75 मीटर का थ्रो करते हुए नेशनल रिकॉर्ड बनाया और इसके बाद भारतीय एथलेटिक्स में उनकी पहचान तेजी से बढ़ी।
87.05 मीटर तक फेंक चुके हैं भाला
घरेलू प्रतियोगिताओं में लगातार 80 मीटर से अधिक दूरी हासिल करने के कारण रोहित यादव देश के प्रमुख जेवलिन थ्रोअर्स में शामिल हुए। इंटर-स्टेट सीनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने 87.05 मीटर का शानदार थ्रो करते हुए गोल्ड मेडल भी अपने नाम किया था।
रोहित 2022 वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। वहां उन्होंने 78.72 मीटर का थ्रो किया था। इसके अलावा कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में वह 82.22 मीटर के प्रदर्शन के साथ छठे स्थान पर रहे थे।
कभी बांस के डंडों से अभ्यास करने वाले रोहित यादव आज दुनिया के बड़े एथलेटिक्स मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में पदक भले ही उनके हाथ नहीं आया, लेकिन उनका संघर्ष और प्रदर्शन भारतीय जेवलिन थ्रो में मौजूद गहराई और नई संभावनाओं को जरूर दिखाता है।