Knews Desk– कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत की उम्मीदें सिर्फ बड़े और चर्चित खिलाड़ियों पर ही नहीं, बल्कि उन खिलाड़ियों पर भी टिकी हैं जिन्होंने कठिन परिस्थितियों को हराकर इस मंच तक पहुंचने का सफर तय किया है। ऐसा ही एक नाम है बिहार के 28 वर्षीय पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार, जिनकी कहानी संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास की मिसाल है। कभी परिवार का पेट भरने के लिए सब्जियां बेचने वाले और कोरोना काल में ई-रिक्शा चलाने वाले झंडू आज ग्लासगो में भारत के लिए पदक जीतने के इरादे से उतरने वाले हैं।
बिहार के नालंदा जिले के हरनौत गांव में जन्मे झंडू कुमार का बचपन बेहद कठिन रहा। महज पांच साल की उम्र में पोलियो ने उनके पैरों को प्रभावित कर दिया। इसके बाद उन्हें चलने-फिरने के लिए बैसाखियों का सहारा लेना पड़ा। शारीरिक चुनौती के साथ-साथ आर्थिक तंगी ने भी उनका जीवन बेहद मुश्किल बना दिया। परिवार की मदद करने के लिए उन्होंने छोटी उम्र से ही संघर्ष शुरू कर दिया। कभी सड़क किनारे सब्जियां बेचकर घर का खर्च चलाया तो कभी मजदूरी की। कोरोना महामारी के दौरान जब आमदनी के दूसरे साधन खत्म हो गए, तब उन्होंने ई-रिक्शा चलाकर परिवार की जिम्मेदारी निभाई। हालांकि आर्थिक संकट इतना गहरा था कि बाद में उन्हें अपना ई-रिक्शा भी बेच देना पड़ा।
इन तमाम मुश्किलों के बीच झंडू ने खेलों से अपना रिश्ता नहीं छोड़ा। शुरुआत में उन्होंने एथलेटिक्स में करियर बनाने की कोशिश की। शॉट पुट, डिस्कस थ्रो और भाला फेंक जैसी स्पर्धाओं में उन्होंने लगातार मेहनत की, लेकिन मनचाही सफलता नहीं मिली। अभ्यास के दौरान उनकी शारीरिक ताकत और फिटनेस को देखकर बिहार के एक खेल अधिकारी ने उन्हें पैरा पावरलिफ्टिंग में हाथ आजमाने की सलाह दी। यही सलाह उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई।इसके बाद झंडू कुमार ने पूरी लगन के साथ पावरलिफ्टिंग की ट्रेनिंग शुरू की। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत में कोई कमी नहीं छोड़ी। लगातार अभ्यास और राष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन के दम पर उन्होंने भारतीय टीम में जगह बनाई। उनकी ताकत, तकनीक और आत्मविश्वास ने उन्हें देश के बेहतरीन पैरा पावरलिफ्टरों में शामिल कर दिया।
अब कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में झंडू कुमार पुरुषों की पैरा पावरलिफ्टिंग हैवीवेट स्पर्धा में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उनसे देश को पदक की उम्मीद है। उनके लिए यह सिर्फ एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष, त्याग और मेहनत का परिणाम है। जिस खिलाड़ी ने कभी दो वक्त की रोटी के लिए सड़कों पर मेहनत की, आज वही अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा ऊंचा करने का सपना लेकर उतरेगा।झंडू कुमार की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो कठिन परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। उन्होंने साबित किया है कि शारीरिक चुनौती या आर्थिक तंगी किसी व्यक्ति की मंजिल तय नहीं करती, बल्कि उसका हौसला और मेहनत उसे आगे बढ़ाते हैं। ग्लासगो में अगर झंडू कुमार भारत के लिए पदक जीतते हैं, तो वह सिर्फ एक मेडल नहीं होगा, बल्कि संघर्ष पर जीत और सपनों की उड़ान का प्रतीक होगा।आज पूरे देश की निगाहें झंडू कुमार पर हैं। हर भारतीय यही उम्मीद कर रहा है कि बिहार का यह जांबाज खिलाड़ी कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में अपने दमदार प्रदर्शन से भारत की झोली में एक और पदक डालकर करोड़ों लोगों का सिर गर्व से ऊंचा कर देगा।