Knews Desk- आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या राघव चड्ढा की राज्यसभा सदस्यता पर कोई असर पड़ेगा या वह बरकरार रहेगी। सूत्रों के मुताबिक, राघव चड्ढा ने AAP छोड़कर बीजेपी में शामिल होने का फैसला किया है। उनके साथ AAP के कई अन्य राज्यसभा सांसद भी पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम सकते हैं। बताया जा रहा है कि यह बदलाव सामूहिक रूप से हुआ है और इसकी जानकारी राज्यसभा सभापति को भी दे दी गई है।

राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि AAP के राज्यसभा में कुल 10 सांसदों में से दो-तिहाई से अधिक सांसद इस फैसले के समर्थन में हैं। उनके अनुसार, सभी संबंधित सांसदों ने हस्ताक्षरित दस्तावेज सभापति को सौंप दिए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास राजनीति में आगे बढ़ने के लिए या तो पीछे हटने या फिर नई दिशा चुनने का विकल्प था, और उन्होंने सक्रिय राजनीति जारी रखने का फैसला किया।
क्या कहता है दल-बदल कानून?
भारत में दल-बदल कानून (Anti-Defection Law) संविधान के 52वें संशोधन (1985) के तहत लागू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता को रोकना और विधायकों तथा सांसदों की खरीद-फरोख्त पर लगाम लगाना है।
इस कानून के अनुसार:
- यदि कोई सांसद या विधायक अपनी पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता रद्द हो सकती है।
- लेकिन अगर किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्य एक साथ दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं, तो इसे दल-बदल नहीं बल्कि “विलय (Merger)” माना जाता है।
- ऐसे मामलों में सदस्यों की सदस्यता समाप्त नहीं होती।
क्या राघव चड्ढा की सदस्यता जाएगी?
अगर AAP के राज्यसभा सांसदों में से वास्तव में दो-तिहाई सदस्य एक साथ बीजेपी में शामिल होते हैं, तो इसे कानून के तहत “पार्टी विलय” माना जाएगा। ऐसी स्थिति में राघव चड्ढा समेत सभी सांसदों की सदस्यता सुरक्षित रह सकती है।
लेकिन अंतिम निर्णय राज्यसभा के सभापति के पास होता है, जो सभी दस्तावेजों और परिस्थितियों की जांच के बाद यह तय करेंगे कि यह मामला दल-बदल है या वैध विलय।
राजनीतिक असर
अगर यह राजनीतिक बदलाव आधिकारिक रूप लेता है, तो इसका असर केवल AAP तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा। AAP को संसदीय स्तर पर बड़ा नुकसान हो सकता है, जबकि बीजेपी की स्थिति और मजबूत हो सकती है। राघव चड्ढा के बीजेपी में शामिल होने के बाद अब पूरा मामला दल-बदल कानून के कानूनी प्रावधानों पर टिक गया है। यदि इसे “विलय” माना जाता है तो उनकी राज्यसभा सदस्यता बनी रह सकती है, लेकिन अगर यह दल-बदल की श्रेणी में आता है तो सदस्यता पर खतरा भी बन सकता है। अब सबकी नजर राज्यसभा सभापति के फैसले पर टिकी है।