महिला वकीलों की गरिमा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अदालत परिसरों में सुविधाओं की कमी पर जताई चिंता

Knews Desk- देश की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India ने महिला अधिवक्ताओं की गरिमा, सुरक्षा और कार्यस्थल पर बुनियादी सुविधाओं की कमी को गंभीर मुद्दा मानते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि अदालत परिसर केवल मुकदमों की सुनवाई का स्थान नहीं है, बल्कि यह वकीलों के लिए एक पूर्ण कार्यस्थल भी है, जहां उन्हें सम्मानजनक और सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए।

यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसे महिला वकीलों के एक समूह ने दायर किया था। याचिका में देशभर के हाई कोर्ट, जिला अदालतों, ट्रिब्यूनलों और अन्य न्यायिक मंचों में महिलाओं के लिए बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी का मुद्दा उठाया गया। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि कई अदालत परिसरों में लेडीज़ बार रूम, स्वच्छ शौचालय, चेंजिंग रूम, और यहां तक कि नर्सिंग जैसी आवश्यक सुविधाएं भी पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं। इस कमी के कारण महिला अधिवक्ताओं को अपने पेशेवर दायित्व निभाने में लगातार कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले गरिमापूर्ण जीवन और सम्मानजनक कार्य के अधिकार से सीधे जुड़ा हुआ माना। अदालत ने कहा कि जब महिलाएं न्याय व्यवस्था का सक्रिय हिस्सा बन रही हैं, तब उनके लिए सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य वातावरण सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है। अदालत ने इस विषय पर केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों और संबंधित न्यायिक संस्थाओं को नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया है।

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने केवल महिला वकीलों की समस्याओं तक ही बात सीमित नहीं रखी, बल्कि युवा अधिवक्ताओं की आर्थिक चुनौतियों पर भी गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि वकालत के शुरुआती वर्षों में अधिकांश युवा वकीलों के पास स्थिर आय का कोई स्रोत नहीं होता, जिससे कई प्रतिभाशाली लोग यह पेशा छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं। इससे अंततः न्यायिक प्रणाली की गुणवत्ता और उपलब्धता पर भी असर पड़ता है।

इस समस्या के समाधान के लिए अदालत ने “यंग लॉयर्स प्रोफेशनल असिस्टेंस फंड” या “यंग एडवोकेट्स कॉर्पस फंड” जैसी व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया है। प्रस्ताव के अनुसार, इस फंड से शुरुआती वर्षों में युवा वकीलों को मासिक आर्थिक सहायता दी जा सकती है, जिससे वे अपने पेशे में स्थिरता प्राप्त कर सकें। अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि इस सहायता की अवधि लगभग तीन वर्षों तक हो सकती है, जिसे धीरे-धीरे घटाकर छह से सात वर्षों में समाप्त किया जा सकता है, ताकि वकील आत्मनिर्भर बन सकें।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस फंड में वरिष्ठ व सफल अधिवक्ताओं से स्वैच्छिक योगदान लिया जा सकता है। इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकारें भी इसमें योगदान दें, जबकि अदालतों द्वारा वसूली जाने वाली कोर्ट फीस का एक हिस्सा भी इस कोष में शामिल किया जा सकता है। न्यायिक कार्यवाहियों से जुड़े खर्चों का एक हिस्सा भी इस फंड के लिए उपयोग किए जाने का सुझाव दिया गया है। साथ ही, योगदान देने वालों को कर छूट और अन्य प्रोत्साहन देने पर भी विचार किया गया है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ये सभी सुझाव प्रारंभिक और विचाराधीन हैं तथा अंतिम निर्णय संबंधित पक्षों के विस्तृत विचार-विमर्श के बाद लिया जाएगा। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के महाधिवक्ताओं, केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल और केंद्र शासित प्रदेशों के स्थायी अधिवक्ताओं को अगली सुनवाई में उपस्थित रहने का निर्देश दिया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *