हिमालयी आपदा का बढ़ा खतरा, नेपाल ने भारत-चीन के सामने रखा बड़ा सहयोग प्रस्ताव

Knews Desk– नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने हिमालयी जलवायु संकट से निपटने के लिए ‘हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म’ बनाने का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव के तहत नेपाल, भारत और चीन मिलकर हिमालयी क्षेत्र में जलवायु से जुड़ी आपदाओं के खतरे को कम करने के लिए काम कर सकते हैं। शाह ने कहा कि इस तंत्र का नेतृत्व तीनों देश मिलकर करें और आपदा प्रबंधन से जुड़ी जानकारी और विशेषज्ञता साझा की जाए।

शाह ने हाल में नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, 26 अगस्त को आई इस आपदा में 1,451 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 6 हजार से ज्यादा लोग अभी भी लापता हैं। उन्होंने कहा कि बढ़ता वैश्विक तापमान हिमालय की कमजोर प्राकृतिक व्यवस्था को अस्थिर कर रहा है और इसका प्रभाव सिर्फ नेपाल तक सीमित नहीं है।नेपाल के प्रधानमंत्री ने कहा कि हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में करीब 2 अरब लोग रहते हैं। यह क्षेत्र इन लोगों के लिए पानी, पर्यावरण, खेती और आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। हिमालय में होने वाले बदलावों का असर इस क्षेत्र से दूर रहने वाली आबादी पर भी पड़ सकता है। इसी वजह से उन्होंने हिमालयी क्षेत्र को अलग-अलग देशों के बीच बंटी हुई जानकारी का क्षेत्र बनाने के बजाय अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रयोगशाला के रूप में विकसित करने की बात कही।प्रस्तावित मैकेनिज्म के तहत तीनों देश सैटेलाइट से मिलने वाली जानकारी और विशेषज्ञता साझा कर सकते हैं। इसके जरिए खतरनाक ग्लेशियल झीलों पर नजर रखने की व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाली ऐसी झीलों से अचानक बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है। समय रहते इनके बारे में जानकारी मिलने पर प्रभावित क्षेत्रों को अलर्ट किया जा सकता है।

शाह ने भारत, चीन और नेपाल के बीच अर्ली वॉर्निंग सिस्टम को मजबूत करने पर भी जोर दिया। इसका उद्देश्य बाढ़ और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं की पहले जानकारी उपलब्ध कराना है, ताकि समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके और राहत-बचाव की तैयारी की जा सके। बड़ी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में तीनों देशों के बीच सीमा के आर-पार राहत और बचाव कार्य में सहयोग की भी बात कही गई है।नेपाल के प्रधानमंत्री ने पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने के खतरे को भी गंभीर बताया। पर्माफ्रॉस्ट लंबे समय से जमी जमीन और उसमें मौजूद बर्फ को कहा जाता है। इसके पिघलने से ग्लेशियरों के नीचे पहाड़ों की ढलान कमजोर हो सकती है। इससे बर्फ और चट्टानों के खिसकने, भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।शाह ने कहा कि हाल की घटनाओं में नेपाल-चीन सीमा के दोनों तरफ भारी नुकसान हुआ और बाढ़ का पानी आगे बढ़ते हुए भारत तक पहुंचा। ऐसे में हिमालय से जुड़े देशों के बीच बेहतर समन्वय, समय पर जानकारी साझा करना और आपदा के दौरान सहयोग भविष्य में नुकसान कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *