Knews Desk– रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते का त्योहार नहीं है, बल्कि इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं और ऐतिहासिक कथाओं की लंबी परंपरा भी जुड़ी हुई है। सावन पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला यह पर्व समय के साथ कई रूपों में सामने आया। वैदिक काल में रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा का उल्लेख मिलता है, जबकि पुराणों और महाभारत से जुड़ी कई कथाएं भी रक्षाबंधन के महत्व को बताती हैं।
वैदिक काल से जुड़ी है रक्षा सूत्र की परंपरा
मान्यता है कि प्राचीन समय में ऋषि-मुनि अपने शिष्यों और यजमानों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा करते थे। इसे सुरक्षा और मंगलकामना का प्रतीक माना जाता था। अथर्ववेद में रक्षा सूत्र बांधने के दौरान बोले जाने वाले मंत्र का उल्लेख मिलता है। इसी परंपरा को आगे चलकर रक्षाबंधन से जोड़कर देखा गया।
राजा बलि और भगवान विष्णु की कथा
रक्षाबंधन से जुड़ी एक प्रमुख कथा राजा बलि और भगवान विष्णु के वामन अवतार की है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण और श्रीमद्भागवत में वर्णित कथा के अनुसार, राजा बलि ने देवताओं को पराजित कर अपना प्रभाव बढ़ा लिया था। भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर उनसे तीन पग भूमि मांगी। दो पग में उन्होंने पृथ्वी और आकाश नाप लिया। तीसरे पग के लिए बलि ने अपना सिर आगे कर दिया।
कथा के अनुसार, भगवान विष्णु बलि के यहां रहने लगे। लक्ष्मी जी ने उन्हें वापस लाने के लिए बलि को रक्षा सूत्र बांधकर अपना भाई बनाया और उनसे विष्णु जी को वापस मांग लिया। इस कथा को राखी के भाई-बहन वाले भाव से जोड़ा जाता है।
इंद्र की कलाई पर शची ने बांधा रक्षा सूत्र
एक अन्य मान्यता भविष्य पुराण से जुड़ी है। इसमें देवताओं के राजा इंद्र की पत्नी शची द्वारा उन्हें रक्षा सूत्र बांधने का वर्णन मिलता है। देवताओं और दैत्यों के युद्ध के समय गुरु बृहस्पति के निर्देश पर शची ने इंद्र की कलाई पर मंत्रयुक्त धागा बांधा। इसके बाद इंद्र युद्ध में विजयी हुए।
महाभारत में द्रौपदी-कृष्ण की कथा
महाभारत से भी राखी की एक लोकप्रिय कथा जुड़ी है। मान्यता है कि द्रौपदी ने भगवान कृष्ण को रक्षा सूत्र बांधा था और कृष्ण ने संकट के समय उनकी रक्षा की। हालांकि, इस कथा के अलग-अलग लोक और धार्मिक संस्करण मिलते हैं।
कर्णावती और हुमायूं की कहानी कितनी सच?
इतिहास में रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूं की कहानी भी रक्षाबंधन से जोड़ी जाती है। प्रचलित लोककथा के अनुसार, गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के मेवाड़ पर हमले के दौरान रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर मदद मांगी थी। हालांकि, तत्कालीन फारसी दस्तावेजों में इस घटना का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता।
रवींद्रनाथ टैगोर ने दिया भाईचारे का संदेश
बाद के दौर में रक्षाबंधन सामाजिक एकता का प्रतीक भी बना। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर ने लोगों से राखी बांधकर भाईचारे और एकता का संदेश देने की अपील की थी। इससे त्योहार को सामाजिक और राष्ट्रीय एकजुटता से भी जोड़ा गया।
आज कैसे बदल गया राखी का स्वरूप?
आज रक्षाबंधन का स्वरूप काफी बदल चुका है। पारंपरिक धागे से लेकर डिजाइनर राखी, चांदी की राखी और ब्रेसलेट स्टाइल राखियां बाजार में उपलब्ध हैं। बहनें अब ऑनलाइन और कूरियर के जरिए भी राखी भेजती हैं। यानी सदियों पुरानी रक्षा सूत्र की परंपरा आज भी कायम है, लेकिन बदलते समय के साथ इसका अंदाज जरूर बदल गया है।