शिव शंकर सविता- आज पूरा देश डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती मना रहा है। 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में जन्मे डॉ. भीमराव अंबेडकर को अक्सर “संविधान के पिता” के रूप में याद किया जाता है, लेकिन उनका जीवन और योगदान इस एक पहचान से कहीं अधिक व्यापक और प्रेरणादायक है। उनकी 135वीं जयंती पर जब हम उनके जीवन को करीब से देखते हैं, तो यह साफ होता है कि वे केवल संविधान निर्माता ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी विचारक, महान शिक्षाविद और सामाजिक क्रांति के अग्रदूत थे। बाबा साहेब का जीवन शुरुआत से ही संघर्षों से भरा रहा। एक दलित परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें बचपन में भेदभाव का सामना करना पड़ा। स्कूल में उन्हें अन्य बच्चों के साथ बैठने या एक ही नल से पानी पीने तक की अनुमति नहीं थी। लेकिन इन कठिनाइयों ने उनके इरादों को कमजोर नहीं किया, बल्कि उन्हें और मजबूत बनाया। उन्होंने शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया और दुनिया के शीर्ष संस्थानों में अपनी पहचान बनाई।
असली नाम सकपाल… बाद में बने आंबेडकर
बहुत कम लोग जानते हैं कि “आंबेडकर” उनका मूल उपनाम नहीं था। उनका असली सरनेम ‘सकपाल’ था। बाद में उनके एक शिक्षक महादेव अंबेडकर ने स्नेहवश उनका नाम बदलकर अंबेडकर कर दिया, जो आगे चलकर उनकी पहचान बन गया। यह छोटी-सी घटना उनके जीवन में शिक्षा और गुरु के महत्व को भी दर्शाती है। शिक्षा के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियां असाधारण थीं। उन्होंने बंबई विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका की कोलंबिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट हासिल की। इसके बाद वे इंग्लैंड केलंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स पहुंचे, जहां उन्होंने अर्थशास्त्र में और उच्च अध्ययन किया। साथ ही ग्रेज़ इन से कानून की पढ़ाई भी की। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को नहीं छोड़ा और अपनी मेहनत से एक नई मिसाल कायम की।
भारत के पहले कानून मंत्री, संविधान निर्माण में दिया अहम योगदान
स्वतंत्र भारत में बाबा साहेब ने देश के पहले कानून मंत्री के रूप में कार्य किया। उन्होंने न केवल संविधान के निर्माण में अहम भूमिका निभाई, बल्कि श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों के लिए भी ऐतिहासिक फैसले लिए। आज देश में 8 घंटे का कार्यदिवस लागू है, जिसका श्रेय भी उन्हें ही जाता है। उन्होंने हिंदू कोड बिल के जरिए महिलाओं को संपत्ति और विवाह में समान अधिकार दिलाने की कोशिश की, लेकिन जब यह बिल पारित नहीं हो सका, तो उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। यह उनके नैतिक साहस का बड़ा उदाहरण है। बाबा साहेब की दूरदर्शिता भी उतनी ही उल्लेखनीय थी। उनकी पुस्तक “थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स” में उन्होंने राज्यों के पुनर्गठन का सुझाव दिया था। उन्होंने मध्य प्रदेश और बिहार के विभाजन की जो बात कही थी, वह दशकों बाद सच साबित हुई, जब साल 2000 में झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे नए राज्यों का गठन हुआ। यह उनकी राजनीतिक समझ और भविष्य की सोच को दर्शाता है।
शिक्षा और समानता के जरिए ही समाज का विकास संभव- आंबेडकर जी
बाबा साहेब का मानना था कि समाज में असली बदलाव शिक्षा और समानता के जरिए ही संभव है। उनका प्रसिद्ध संदेश “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो” आज भी करोड़ों लोगों के लिए मार्गदर्शक है। आज, उनकी 135वीं जयंती पर, देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है। लेकिन उनके विचारों को अपनाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। बाबा साहेब का जीवन हमें यह सिखाता है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, शिक्षा, दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास के बल पर किसी भी ऊंचाई को हासिल किया जा सकता है।