KNEWS DESK- दुर्गाष्टमी पर मां दुर्गा की पूजा के साथ हलवा, पूरी और काले चने का भोग लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। कन्या पूजन के दौरान भी इसी प्रसाद को विशेष रूप से परोसा जाता है। आखिर इस खास भोग का धार्मिक महत्व क्या है और व्रत के बाद इसे खाने की परंपरा क्यों प्रचलित है? आइए जानते हैं।
शारदीय नवरात्रि में दुर्गाष्टमी का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन भक्त मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। नवरात्रि के दौरान कई श्रद्धालु उपवास रखते हैं और अष्टमी के दिन कन्या पूजन के साथ व्रत का समापन करते हैं। इस पूजा में हलवा, पूरी और काले चने का प्रसाद विशेष रूप से तैयार किया जाता है। इसे पहले माता रानी को अर्पित किया जाता है और फिर कन्याओं तथा परिवार के सदस्यों में बांटा जाता है। यह परंपरा धार्मिक आस्था, सात्विक भोजन और कन्या पूजन से जुड़ी हुई है।
दुर्गाष्टमी पर हलवा, पूरी और काले चने का भोग लगाने के पीछे धार्मिक मान्यता है कि देवी को श्रद्धापूर्वक सात्विक भोजन अर्पित करने से भक्तों को सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। नवरात्रि के अंतिम दिनों में कन्या पूजन को विशेष स्थान दिया गया है। छोटी कन्याओं को देवी के स्वरूप के रूप में सम्मान देकर उनके पैर धोने, तिलक लगाने और भोजन कराने की परंपरा निभाई जाती है। इस अवसर पर तैयार किया जाने वाला हलवा, पूरी और चना पूजा का पारंपरिक प्रसाद माना जाता है। हालांकि, भोग की सामग्री और पूजा की विधि अलग-अलग क्षेत्रों तथा परिवारों की परंपराओं के अनुसार बदल सकती है।
हलवा, पूरी और काले चने का यह मेल स्वाद के साथ पोषण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। काले चने में प्रोटीन, फाइबर और कई आवश्यक पोषक तत्व पाए जाते हैं। वहीं, सूजी से बने हलवे में कार्बोहाइड्रेट होता है, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है। पूरी भी कार्बोहाइड्रेट और वसा का स्रोत होती है। इस तरह इन खाद्य पदार्थों से शरीर को अलग-अलग प्रकार के पोषक तत्व मिलते हैं। हालांकि, हलवा और पूरी में घी या तेल तथा चीनी की मात्रा अधिक होने पर इनका सेवन सीमित मात्रा में करना बेहतर रहता है।
नवरात्रि के दौरान उपवास रखने वाले लोगों के लिए व्रत खोलते समय भोजन की मात्रा और शरीर की जरूरतों का ध्यान रखना जरूरी है। लंबे समय तक खाली पेट रहने के बाद एकदम अधिक भोजन करने के बजाय धीरे-धीरे खाना बेहतर हो सकता है। काले चने में मौजूद फाइबर पाचन में मदद करता है, लेकिन कुछ लोगों को अधिक मात्रा में चना खाने से गैस या पेट फूलने की समस्या हो सकती है। इसलिए अपनी सेहत के अनुसार भोजन करना उचित है। यह कहना सही नहीं होगा कि हलवा, पूरी और चना हर व्यक्ति के लिए सबसे हल्का या आसानी से पचने वाला भोजन है।
दुर्गाष्टमी पर इस पारंपरिक भोग का महत्व केवल भोजन तक सीमित नहीं है। यह देवी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने, परिवार के साथ प्रसाद बांटने और कन्याओं का सम्मान करने की परंपरा से भी जुड़ा है। मां महागौरी की पूजा के बाद श्रद्धालु कन्या पूजन करते हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार कन्याओं को भोजन, दक्षिणा या उपहार देते हैं। धार्मिक विश्वास के अनुसार, यह सेवा और सम्मान देवी की आराधना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस प्रकार हलवा, पूरी और काले चने का भोग दुर्गाष्टमी की धार्मिक परंपरा, सामूहिक सहभागिता और प्रसाद वितरण का प्रतीक बना हुआ है।