अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर को रखा जाएगा। संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए माताएं यह व्रत रखती हैं। इस बार पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:36 बजे से 6:54 बजे तक रहेगा। जानिए अष्टमी तिथि, तारों के दर्शन का समय और पूजा की पूरी विधि।
KNEWS DESK- संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना के लिए रखा जाने वाला अहोई अष्टमी का व्रत इस साल 1 नवंबर 2026, रविवार को मनाया जाएगा। इस दिन माताएं पूरे दिन व्रत रखकर शाम को अहोई माता की पूजा करती हैं और अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता की आराधना से संतान के जीवन में सुख-समृद्धि और परिवार में खुशहाली की कामना की जाती है।
इस बार अहोई अष्टमी की पूजा के लिए केवल 1 घंटा 18 मिनट का शुभ मुहूर्त बताया गया है। ऐसे में व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए पूजा की तैयारियां पहले से कर लेना बेहतर रहेगा, ताकि निर्धारित समय में विधि-विधान से पूजा संपन्न की जा सके।
अहोई अष्टमी 2026: तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट पर शुरू होगी और 2 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। व्रत की परंपरा के अनुसार, अहोई अष्टमी 1 नवंबर को मनाई जाएगी। पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:36 बजे से 6:54 बजे तक निर्धारित बताया गया है। इस दौरान अहोई माता की पूजा और व्रत कथा का पाठ किया जा सकता है। अष्टमी तिथि 1 नवंबर 2026 को दोपहर 2:51 बजे शुरू होगी और 2 नवंबर को दोपहर 1:10 बजे समाप्त होगी। पूजा का शुभ समय शाम 5:36 बजे से 6:54 बजे तक रहेगा। तारों के दर्शन शाम लगभग 5:58 बजे होने का अनुमान है, जबकि चंद्रोदय रात लगभग 11:40 बजे बताया गया है।
अहोई अष्टमी की पूजा विधि
अहोई अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें। इसके बाद अहोई माता का स्मरण करते हुए संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना के साथ व्रत का संकल्प लें। महिलाएं अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार निर्जला या फलाहार व्रत रखती हैं।
पूजा के लिए घर की दीवार पर गेरू से अहोई माता और उनके सात पुत्रों का चित्र बनाया जाता है। यदि चित्र बनाना संभव न हो, तो माता की तस्वीर स्थापित करके पूजा की चौकी सजाई जा सकती है।
इसके बाद चौकी पर जल से भरा कलश रखें और रोली, अक्षत, फूल, दीपक तथा प्रसाद की व्यवस्था करें। अहोई माता को हलवा-पूड़ी या पुए का भोग लगाया जाता है। शाम को शुभ मुहूर्त में दीपक जलाकर विधि-विधान से पूजा करें और अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें। इस दौरान संतान की खुशहाली और दीर्घायु की प्रार्थना करें।
तारों को अर्घ्य देकर किया जाता है व्रत का पारण
अहोई अष्टमी पर तारों के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। शाम को तारे निकलने पर करवे या लोटे से जल लेकर तारों को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद संतान के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना करके व्रत खोला जाता है।
कुछ परिवारों में अपनी परंपरा के अनुसार चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करने की भी मान्यता है। इसलिए व्रत रखने वाली महिलाएं अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा और पारण की विधि अपना सकती हैं।
अहोई अष्टमी के अवसर पर पूजा का समय सीमित होने के कारण व्रत से जुड़ी सभी सामग्री पहले से तैयार रखना उपयोगी रहेगा।