Knews Desk- उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। इस मामले में अदालत ने राज्य सरकार से जवाब तलब करते हुए विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
याचिका में कहा गया है कि ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उसी ग्राम प्रधान को प्रशासक बनाना लोकतांत्रिक व्यवस्था और पंचायती राज कानून की भावना के विपरीत है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि कार्यकाल खत्म होने के बाद निर्वाचित प्रतिनिधि का अधिकार भी समाप्त हो जाता है, इसलिए उन्हें प्रशासक के रूप में नियुक्त करना उचित नहीं माना जा सकता। इस आधार पर सरकार के आदेश को रद्द करने की मांग की गई है।
दरअसल, उत्तर प्रदेश की 57 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया है। पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाने की स्थिति में राज्य सरकार ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिया था कि निवर्तमान ग्राम प्रधानों को नई पंचायतों के गठन तक या अधिकतम छह माह के लिए प्रशासक नियुक्त किया जाए। हालांकि उन्हें केवल दैनिक और नियमित प्रशासनिक कार्य करने की अनुमति दी गई है तथा किसी भी बड़े नीतिगत फैसले के लिए जिलाधिकारी की मंजूरी आवश्यक होगी।
मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा कि इस नियुक्ति का कानूनी आधार क्या है और किन परिस्थितियों में यह फैसला लिया गया। अदालत ने राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए समय दिया है।
इस मामले पर अगली सुनवाई में सरकार का जवाब सामने आने के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने का फैसला जारी रहेगा या फिर इसमें कोई बदलाव किया जाएगा। फिलहाल यह मुद्दा प्रदेश की पंचायत राजनीति और आगामी पंचायत चुनावों के मद्देनजर काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।