यूपी चुनाव से पहले क्यों बढ़ जाती है दलबदलू नेताओं की डिमांड? 4 चुनावी आंकड़े खोलते हैं पूरा राज

उत्तर प्रदेश की सियासत में चुनाव से पहले नेताओं का एक दल छोड़कर दूसरे खेमे में जाना आम है. लेकिन क्या नेता के साथ उसका वोट बैंक भी दूसरी पार्टी के खाते में चला जाता है? पिछले चार विधानसभा चुनावों के आंकड़े इस सवाल की दिलचस्प तस्वीर सामने रखते हैं.

KNews Desk: उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव नजदीक आते ही दलबदल की हलचल तेज हो जाती है. नेता अपनी राजनीतिक जमीन और भविष्य को देखते हुए पाला बदलते हैं, वहीं पार्टियां भी जातीय समीकरण और स्थानीय प्रभाव को साधने के लिए दूसरे दलों के नेताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करती हैं. हालांकि, किसी नेता का पार्टी बदल लेना यह तय नहीं करता कि उसके समर्थक भी उसी के साथ नई पार्टी को वोट देंगे.

यूपी में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू होने के साथ एक बार फिर दलबदल की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर पार्टियां दलबदल करने वाले नेताओं पर इतना भरोसा क्यों जताती हैं और चुनाव में उनकी वास्तविक भूमिका कितनी होती है.

2022 में कितने दलबदलू मैदान में उतरे?

2022 के विधानसभा चुनाव में करीब 206 ऐसे उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे, जिन्होंने अलग-अलग पार्टियों से चुनाव लड़ा था. रिपोर्ट के मुताबिक, 1977 के बाद यह यूपी विधानसभा चुनाव में दलबदलू उम्मीदवारों की सबसे कम संख्या थी.

इन 206 उम्मीदवारों में से लगभग हर पांचवां उम्मीदवार ही चुनाव जीतने में सफल रहा. इससे साफ होता है कि केवल पार्टी बदलने से चुनाव जीतना आसान नहीं हो जाता.

2022 में बीजेपी से समाजवादी पार्टी में जाने वाले कई बड़े नेताओं ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं. योगी सरकार में मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी बीजेपी छोड़कर सपा में शामिल हुए थे. इन नेताओं ने बीजेपी पर पिछड़े, दलित और किसानों की अनदेखी के आरोप लगाए थे.

हालांकि चुनाव परिणामों में तस्वीर अलग रही. स्वामी प्रसाद मौर्य फाजिलनगर और धर्म सिंह सैनी नकुड़ से चुनाव हार गए. वहीं दारा सिंह चौहान घोसी सीट जीतने में कामयाब रहे. बाद में उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दिया और बीजेपी में वापस लौट गए.

इसी तरह कांग्रेस छोड़कर सपा में पहुंचे इमरान मसूद को भी विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिला. 2017 में दलबदलुओं का प्रदर्शन रहा शानदार दलबदलू नेताओं के लिए 2022 का प्रदर्शन कमजोर रहा, लेकिन हर चुनाव में तस्वीर ऐसी नहीं रही है.

2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 65 दलबदलू नेताओं को टिकट दिया था. इनमें से 52 उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहे. यानी उनकी सफलता दर करीब 80 फीसदी रही.

इसके मुकाबले समाजवादी पार्टी ने 26 दलबदलुओं को मैदान में उतारा, लेकिन इनमें से केवल 3 उम्मीदवार ही जीत सके. वहीं BSP के 29 दलबदलू उम्मीदवारों में सिर्फ 2 चुनाव जीत पाए.

यह आंकड़ा बताता है कि जब किसी पार्टी के पक्ष में मजबूत राजनीतिक लहर होती है, तो उस पार्टी में शामिल होकर चुनाव लड़ने वाले दलबदलुओं को भी उसका फायदा मिल सकता है.

2012 में सपा को दलबदलुओं से मिला फायदा

2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 32 दलबदलू नेताओं को टिकट दिया था और इनमें से 14 उम्मीदवार जीतकर विधानसभा पहुंचे.

वहीं बीजेपी ने 21 दलबदलू उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, लेकिन इनमें से सिर्फ एक ही चुनाव जीत सका.

यानी दलबदलू नेता की सफलता केवल उसके व्यक्तिगत प्रभाव पर निर्भर नहीं करती. उस समय राज्य में किस पार्टी के पक्ष में माहौल है, संगठन कितना मजबूत है और उम्मीदवार का स्थानीय समीकरण कितना मजबूत है, ये सभी चीजें चुनावी नतीजे को प्रभावित करती हैं.

2007 में BSP के दलबदलुओं ने किया था कमाल

2007 का विधानसभा चुनाव भी इस मामले में अहम रहा. उस चुनाव में BSP ने 44 दलबदलू उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिनमें 27 चुनाव जीतने में कामयाब रहे.

इससे एक बार फिर यह संकेत मिलता है कि जब किसी राजनीतिक दल के पक्ष में मजबूत चुनावी माहौल बनता है, तो दूसरे दलों से आए नेताओं को भी उसका फायदा मिल सकता है.

सिर्फ नेता नहीं, उसका सामाजिक प्रभाव भी मायने रखता है

किसी नेता के पास व्यक्तिगत समर्थक और प्रभाव जरूर हो सकता है, लेकिन चुनाव केवल उसके नाम पर नहीं जीता जाता. मतदाता पार्टी, नेतृत्व, सरकार के कामकाज, स्थानीय मुद्दों, जातीय समीकरण और उम्मीदवार की छवि जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखकर फैसला करता है.

यही वजह है कि 2022 में बीजेपी छोड़कर सपा में गए कई बड़े नेताओं के बावजूद बीजेपी का चुनावी आधार पूरी तरह प्रभावित नहीं हुआ. बीजेपी ने 2017 में जीती गई अपनी 232 सीटों में से बड़ी संख्या को बरकरार रखा. वहीं कुल 274 सीटों पर पिछली बार जीतने वाली पार्टी ही दोबारा विजयी रही.

इससे संकेत मिलता है कि कई बार किसी पार्टी का संगठन और उसका स्थायी वोट बेस किसी एक नेता के व्यक्तिगत प्रभाव से ज्यादा मजबूत होता है.

फिर पार्टियां दलबदलुओं को क्यों देती हैं टिकट?

दलबदलू नेताओं को साथ लेने के पीछे पार्टियों की रणनीति सिर्फ चुनाव जिताना नहीं होती. ऐसे नेता किसी खास जाति, क्षेत्र या सामाजिक समूह में पार्टी की पहुंच बढ़ाने में मदद कर सकते हैं.

किसी इलाके में मजबूत पकड़ रखने वाला नेता पार्टी के लिए नए वोटरों तक पहुंच का जरिया बन सकता है. साथ ही उसके आने से स्थानीय राजनीतिक समीकरण भी बदल सकते हैं.

हालांकि इसका फायदा तभी ज्यादा मिलता है, जब नेता का व्यक्तिगत प्रभाव, संगठन और पार्टी की चुनावी लहर एक-दूसरे के पक्ष में काम करें.

2027 में फिर दिख सकता है दलबदल का खेल

2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर यूपी में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद राज्य का राजनीतिक समीकरण भी काफी चर्चा में रहा है.

ऐसे में आने वाले समय में दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमे दूसरे दलों के प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर सकते हैं. खास तौर पर OBC, दलित और क्षेत्रीय प्रभाव वाले नेताओं पर राजनीतिक दलों की नजर रह सकती है.

लेकिन पिछले चुनावों के आंकड़े एक बात साफ करते हैं—दलबदलू नेता अपने साथ कितना वोट लेकर आता है, यह उसकी पार्टी बदलने से नहीं, बल्कि उसके व्यक्तिगत प्रभाव, सामाजिक पकड़, स्थानीय संगठन और उस समय चल रही राजनीतिक लहर से तय होता है.

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